Monday, December 27, 2021

16 सिद्धिया

16 सिद्धिया प्राप्त.... सुना तो होगा....
आइये जानिए कि वह 16 सिद्धिया होती कौन सी है?

🚩1. वाक् सिद्धि :-
जो भी वचन बोले जाए वे व्यवहार में पूर्ण हों, 
वह वचन कभी व्यर्थ न जाये, प्रत्येक शब्द का महत्वपूर्ण अर्थ हो,वाक् सिद्धि युक्त व्यक्ति में श्राप और वरदान देने की क्षमता होती हैं...

🚩2. दिव्य दृष्टि सिद्धि:-
दिव्यदृष्टि का तात्पर्य है कि जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में भी चिन्तन किया जाये, उसका भूत, भविष्य और वर्तमान एकदम सामने आ जायेंगे, आगे क्या कार्य करना है, कौन सी घटनाएं घटित होने वाली हैं..??
इसका ज्ञान होने पर व्यक्ति दिव्यदृष्टियुक्त महापुरुष बन जाता है...

🚩3. प्रज्ञा सिद्ध:-
प्रज्ञा का तात्पर्य यह है कि मेधा अर्थात स्मरणशक्ति, बुद्धि, ज्ञान इत्यादि.. ज्ञान के सम्बंधित सारे विषयों को जो अपनी बुद्धि में समेट लेता है वह प्रज्ञावान कहलाता है,जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से सम्बंधित ज्ञान के साथ-साथ भीतर एक चेतनापुंज जाग्रत रहता है.

🚩4. दूरश्रवण सिद्धि :-
इसका तात्पर्य यह है कि भूतकाल में घटित कोई भी घटना, वार्तालाप को पुनः सुनने की क्षमता.

🚩5. जलगमन सिद्धि:-
यह सिद्धि निश्चय ही महत्वपूर्ण है, इस सिद्धि को प्राप्त योगी जल, नदी, समुद्र पर इस तरह विचरण करता है मानों धरती पर गमन कर रहा हो.

🚩6. वायुगमन सिद्धि :-
इसका तात्पर्य है अपने शरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर एक लोक से दूसरे लोक में गमन कर सकता है, एक स्थान से दूसरे स्थान पर सहज तत्काल जा सकता है.

🚩7. अदृश्यकरण सिद्धि:-
अपने स्थूल शरीर को सूक्ष्म रूप में परिवर्तित कर अपने आप को अदृश्य कर देना.... जिससे स्वयं की इच्छा बिना दूसरा उसे देख ही नहीं पाता है.

🚩8. विषोका सिद्धि:-
इसका तात्पर्य है कि अनेक रूपों में अपने आपको परिवर्तित कर लेना.. एक स्थान पर अलग रूप है, दूसरे स्थान पर अलग रूप है.

🚩9. देवक्रियानुदर्शन सिद्धि :-
इस क्रिया का पूर्ण ज्ञान होने पर विभिन्न देवताओं का साहचर्य प्राप्त कर सकता है। उन्हें पूर्ण रूप से अनुकूल बनाकर उचित सहयोग लिया जा सकता है.

🚩10. कायाकल्प सिद्धि:-
कायाकल्प का तात्पर्य है शरीर परिवर्तन।समय के प्रभाव से देह जर्जर हो जाती है, लेकिन कायाकल्प कला से युक्त व्यक्ति सदैव रोगमुक्त और यौवनवान ही बना रहता है...

🚩11. सम्मोहन सिद्धि :-
सम्मोहन का तात्पर्य है कि सभी को अपने अनुकूल बनाने की क्रिया। इस कला को पूर्ण व्यक्ति मनुष्य तो क्या, पशु-पक्षी, प्रकृति को भी अपने अनुकूल बना लेता है.

🚩12. गुरुत्व सिद्धि:-
गुरुत्व का तात्पर्य है गरिमावान। जिस व्यक्ति में गरिमा होती है, ज्ञान का भंडार होता है, और देने की क्षमता होती है, उसे गुरु कहा जाता है। और भगवन कृष्ण को तो जगद्गुरु कहा गया है.

🚩13. पूर्ण पुरुषत्व सिद्धि:-
इसका तात्पर्य है अद्वितीय पराक्रम और निडर, एवं बलवान होना। श्रीकृष्ण में यह गुण बाल्यकाल से ही विद्यमान था... जिस के कारण से उन्होंने ब्रजभूमि में राक्षसों का संहार किया... तदनंतर कंस का संहार करते हुए पुरे जीवन शत्रुओं का संहार कर आर्यभूमि में पुनः धर्म की स्थापना की.

🚩14. सर्वगुण संपन्न सिद्धि:-
जितने भी संसार में उदात्त गुण होते हैं, सभी कुछ उस व्यक्ति में समाहित होते हैं, जैसे – दया, दृढ़ता, प्रखरता, ओज, बल, तेजस्विता, इत्यादि। इन्हीं गुणों के कारण वह सारे विश्व में श्रेष्ठतम व अद्वितीय बन जाता है, इसी प्रकार यह विशिष्ट कार्य करके संसार में लोकहित एवं जनकल्याण करता है.

🚩15.इच्छा मृत्यु सिद्धि:-
इन कलाओं से पूर्ण व्यक्ति कालजयी होता है, काल का उस पर किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं रहता, वह जब चाहे अपने शरीर का त्याग कर नया शरीर धारण कर सकता है.

🚩16. अनुर्मि सिद्धि:-
अनुर्मि का अर्थ है... जिस पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी और भावना-दुर्भावना का कोई प्रभाव न हो.

🚩🙏🙏🙏🚩

Monday, December 13, 2021

गीता पर शपथ क्यों दिलाई जाती है?

कथा कुछ इस प्रकार से है-

भगवान श्रीहरि मूर दैत्य का नाश करने के बाद बैकुंठ लोक में शेष शय्या पर आंखें मूंदे लेटे मन ही मन मुस्कुरा रहे थे.

देवी लक्ष्मी उनकी चरण सेवा कर रही थीं. भगवान को मन में ही मुस्काता देख देवी को कौतूहल हुआ.
देवी लक्ष्मी ने उनसे प्रश्न किया- भगवन आप संपूर्ण जगत का पालन करते हुए भी अपने ऐश्वर्य के प्रति उदासीन से होकर इस क्षीर सागर में नींद ले रहे हैं, इसका क्या कारण है?

श्रीहरि पुनः मुस्कुराए और अपनी मोहक मुस्कान बिखेरते हुए बोले- हे प्रिये मैं नींद नहीं ले रहा बल्कि अपनी अंतर्दृष्टि से अपने उस तेज का साक्षात्कार कर रहा हूं देवी जिसका योगी अपनी दृष्टि से दर्शन कर लेते हैं.

जिस शक्ति के अधीन यह समस्त संसार है मैं जब भी उसका मन में दर्शन करता हूं तब आपको ऐसा प्रतीत होता है कि मैं नींद में डूबा हूं परंतु ऐसा है नहीं. भगवान ने इतनी रहस्यमय तरीके से बात कही कि लक्ष्मीजी को कुछ बातें समझ में आईं कुछ नहीं आईं.

उन्होंने पुनः प्रश्न किया- हे नाथ आपके अतिरिक्त भी कोई शक्ति है जिसका ध्यान स्वयं आप करते हों. यह बात तो मुझे घोर विस्मय में डालती है.

श्रीहरि ने कहा-देवी इस बात को अच्छी प्रकार से समझने के लिए आपको गीता के रहस्य समझने होंगे.

गीता के समस्त अध्याय मेरे उस शरीर के अंग हैं जिसकी आप सेवा करती हैं.
गीता के आरंभ के पांच अध्यायों को मेरे पांच मुख जानें.
छठे से पंद्रहवें अध्याय को मेरी दस भुजाएं समझिए.
सोलहवां अध्याय तो मेरा उदर है जहां क्षुधा शांत होती है.
अंतिम के दो अध्यायों को मेरे चरण कमल समझिए.
भगवान ने गीता के अध्यायों की इस प्रकार व्याख्या कर दी लक्ष्मीजी की उलझन घटने की बजाय और बढ़ने लगी. भगवान ने भांप लिया कि देवी के मन में क्या चल रहा है.

श्रीहरि ने पुनः कहा-देवी जो व्यक्ति गीता के एक भी अध्याय अथवा एक श्लोक का भी प्रतिदिन पाठ करता है वह सुशर्मा की तरह सभी पापों से मुक्त हो जाता है.

अब तो देवी लक्ष्मी और उलझ गईं

उन्होंने संयत भाव में अपनी अधीरता व्यक्त करते हुए-हे नाथ यह आपकी क्या लीला है. एक के बाद एक आप पहेलियां ही कहते जा रहे हैं. कृपया आप मेरी जिज्ञासा शांत करें भगवान पुनः मुस्कुराने लगे और उन्होंने लक्ष्मीदेवी को सुशर्मा की कथा सुनानी शुरू की.

सुशर्मा एक घोर पापी व्यक्ति था. वह हमेशा भोग-विलास में डूबा रहता. मदिरा और मांसाहार इसी में जीवन बिताता. एक दिन सांप काटने से उसकी मृत्यु हो गई.

उसे नरक में यातनाएं झेलीं और फिर से पृथ्वी पर एक बैल के रूप में जन्म लिया.

अपने मालिक की सेवा करते बैल को आठ साल गुजर गए. उसे भोजन कम मिलता लेकिन परिश्रम जरूरत से ज्यादा करनी पड़ती.

एक दिन बैल मूर्च्छित होकर बाजार में गिर पड़ा. बहुत से लोग जमा हो गए. वहां उपस्थित लोगों में से कुछ ने बैल का अगला 
जीवन सुधारने के लिए अपने-अपने हिस्से का कुछ पुण्यदान करना शुरू किया.

उस भीड़ में एक वेश्या भी खड़ी थी. उसे अपने पुण्य का पता नहीं था फिर भी उसने कहा उसके जीवन में जो भी पुण्य रहा हो उसका अंश बैल को मिल जाए.

बैल मरकर यमलोक पहुंचा. बैल के हिस्से में जमा पुण्य का हिसाब-किताब होना शुरू हुआ तो एक बड़े आश्चर्य की बात हुई. ऐसी बात जिसके बारे में यदि धरतीलोक पर किसी व्यक्ति को कहो तो विश्वास ही न करें.

बैल के हिस्से में सर्वाधिक पुण्य उस वेश्या का दान किया हुआ आया था. उसी वेश्या के किए पुण्यदान के कारण बैल को नर्कलोक से मुक्ति हो गई.
इतना ही नहीं उसी पुण्यफल से पृथ्वी लोक का भोग करने के लिए मानव रूप में जन्म देकर भेजा गया. उसके पुण्य इतने थे कि विधाता ने उससे पृथ्वीलोक पर जाने से पहले उसकी इच्छा भी पूछी. ऐसा सौभाग्य करोड़ों में किसी-किसी धर्मात्मा को ही मिलता है.इंसान के रूप में जाने से पहले बैल ने मांगा- हे परमात्मा आप मुझे मानवरूप में पृथ्वी पर भेजने का जो उपकार कर रहे हैं उससे मैं धन्य हो गया हूं. अब आपसे और क्या मांगू. बैलयोनि में मेरा जन्म मेरे पूर्व के कर्मों के दंडस्वरूप ही रहा होगा. इसलिए मैं चाहता हूं कि मनुष्य रूप में जाकर मैं उन कर्मों में न पडूं जो मेरा भावी खराब करेंगे. मनुष्य रूप में इसकी आशंका सर्वाधिक है.

परमात्मा ने पूछा-तो बताओ मैं तुम्हारी कैसे सहायता करूं, अपनी एक इच्छा बताओ

उसने मांगा- मुझे बस वह क्षमता प्रदान करें कि मुझे पूर्वजन्म की समस्त बातें स्मरण रहें उनका स्मरण करके मैं कर्मों से भटकने से स्वयं को रोक सकूंगा. बस इतनी सी कृपा और कर दे.

परमात्मा ने उसकी इच्छा स्वीकार ली और उसे वह योग्यता प्रदान कर दी. पृथ्वीलोक पर आने के बाद उसे पूर्वजन्म स्मरण थे इसलिए उसने सबसे पहले उपकार का फल चुकाने का निर्णय किया.

पृथ्वी पर आकर उसने उस वैश्या को तलाशना शुरू किया जिसके पुण्य से उसे मुक्ति मिली थी. आखिरकार उसने उस वैश्या को खोज ही निकाला.
उसने वेश्या को सारी बातें बताई और फिर पूछा- देवी! आप धन्य हैं. आपके कर्म तो सबसे नीच कर्मों में आते हैं फिर भी आपके पास इतना संचित पुण्य कैसे था, यह घोर आश्चर्य की बात है. मैं जानना चाहता हूं कि कौन सा पुण्य आपने मुझे दान किया था?

वेश्या ने एक तोते की ओर इशारा करके कहा- वह तोता प्रतिदिन कुछ पढ़ता है. उसे सुनकर मेरा मन पवित्र हो गया. वही पुण्य मैंने तुम्हें दान कर दिया था. सुशर्मा के आश्चर्य का तो कोई अंत ही रहा. एक स्त्री ने उस पुण्यफल का दान किया जिसके बारे में उसे पता तक नहीं है और वह पुण्य इतना प्रभावी है कि उसकी अधम योनि ही बदल गई.

उसने तोते को आदरपूर्वक प्रणाम किया और उसके ज्ञान का रहस्य पूछा. तब तोते ने अपने पूर्वजन्म की कथा सुनाई.
तोता बोला-पूर्वजन्म में मैं विद्वान होने के साथ अभिमानी था और सभी विद्वानों के प्रति ईर्ष्यालु था. उनका अपमान और अहित करता था

मरने के बाद मैं अनेक लोकों में भटकता रहा. फिर मुझे तोते के रूप में जन्म मिला लेकिन पुराने पाप के कारण बचपन में ही मेरे माता-पिता की मृत्यु हो गई मैं रास्ते में कहीं अचेत पड़ा था. तभी दैवयोग से वहां से कुछ ऋषि-मुनि गुजरे. मुझे इस अवस्था में देखकर उन्हें दया आई और मुनि मुझे साथ उठा लाए.

आश्रम में लाकर मुझे एक पिंजरे में वहां रख दिया जहां विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती थी.

मैंने वहां गीता का पूरा ज्ञान सीखा.सुनते-सुनते गीता का प्रथम अध्याय मुझे कंठस्थ हो गया. इससे पहले कि मैं अन्य अध्याय सीख पाता एक बहेलिये ने वहां से चुराकर इन देवी को बेच दिया.

मैं अपने स्वभाववश इनको प्रतिदिन गीता के श्लोक सुनाता रहता हूं. वही पुण्य इन्होंने आपको दान किया और आप मानवरूप में आए.श्रीहरि ने लक्ष्मीजी से कहा- देवी जो गीता का प्रथम अध्याय पढ़ता या सुनता है उसे भवसागर पार करने में कोई कठिनाई नहीं होती.

तो इस प्रकार भगवान ने श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न अध्यायों को अपने शरीर का अंग मानते हुए बताया है कि गीता में साक्षात उनका वास है.गीता को स्पर्श करने का अर्थ है आप श्रीनारायण के अंगों का स्पर्श कर रहे हैं. भगवान का स्पर्श करके सौंगंध लेने के बाद कोई असत्य नहीं कहेगा, इसी विश्वास के साथ गीता की सौगंध दी जाती है.

कर्म की व्याख्या करता सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है भगवद्गीता जो सिखाती है कि व्यवहार में मनुष्य का जीवन कैसा होना चाहिए. असत्य बोलने, लालच और मोह में पड़कर अपने निकटजनों को अनुचित सलाह देने और धर्म के विरूद्ध जाना मनुष्य का सिर्फ अपना ही नहीं बल्कि पूरे कुल के नाश का कारण हो जाता है. यह सब सिखाती है गीता. ऐसे ग्रंथ से उत्तम और क्या होगा न्याय की सौगंध के लिए साक्षी रखने को.

!! जय श्री हरि !!

Thursday, November 4, 2021

धूमावती

कैसा है धूमावती माता का स्वरूप :
* मां पार्वती का धूमावती स्वरूप अत्यंत उग्र है। 
* मां धूमावती विधवा स्वरूप में पूजी जाती हैं। 
* मां धूमावती का वाहन कौवा है। 
* श्वेत वस्त्र धारण कर खुले केश रूप में होती हैं।

मंत्र : 
ॐ धूं धूं धूमावत्यै फट्।। 
धूं धूं धूमावती ठ: ठ:।।

मां धूमावती का तांत्रोक्त मंत्र :
धूम्रा मतिव सतिव पूर्णात सा सायुग्मे। 
सौभाग्यदात्री सदैव करुणामयि:।।
धूमावती दस महाविद्या में से सातवीं हैं। 
(दस महाविद्याएं इस प्रकार है- काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी व कमला।)
इनका रूप विकराल है। वृद्धा, कृशकाय, वक्रदंता व विधवा हैं। बिखरे बाल के साथ रथ पर सवार हैं। रथ पर कौआ भी बैठा हुआ है। इनके मुख्य अस्त्र मूसल और सूप हैं। वे इसी से सृष्टि में प्रलय लाने में सक्षम हैं। लक्ष्मी की बड़ी बहन होने के कारण ज्येष्ठा लक्ष्मी भी कही जाती हैं।

पहली कहानी (मुल कहानी): 
मां धूमावती के प्राकट्य से संबंधित कथा अनूठी हैं। जब सती ने पिता के यज्ञ में स्वेच्छा से स्वयं को जला कर भस्म कर दिया तो उनके जलते हुए शरीर से जो धुआं निकला, उससे धूमावती का जन्म हुआ। इसीलिए वे हमेशा उदास रहती हैं। यानी धूमावती धुएं के रूप में सती का भौतिक स्वरूप है। सती का जो कुछ बचा रहा वह एक उदास धुआं था।

दूसरी कहानी (सांकेतिक कहानी):
पुराणों के अनुसार एक बार मां पार्वती को बहुत तेज भूख लगी होती है किंतु कैलाश पर उस समय कुछ न रहने के कारण वे अपनी क्षुधा शांत करने के लिए भगवान शंकर के पास जाती हैं और उनसे भोजन की मांग करती हैं किंतु उस समय शंकरजी अपनी समाधि में लीन होते हैं। मां पार्वती के बार-बार निवेदन के बाद भी शंकरजी ध्यान से नहीं उठते और वे ध्यानमुद्रा में ही मग्न रहते हैं।

मां पार्वती की भूख और तेज हो जाती है और वे भूख से व्याकुल हो उठती हैं, परंतु जब मां पार्वती को खाने की कोई चीज नहीं मिलती है, तब वे श्वास खींचकर शिवजी को ही निगल जाती हैं। भगवान शिव के कंठ में विष होने के कारण मां के शरीर से धुआं निकलने लगता है, उनका स्वरूप श्रृंगारविहीन तथा विकृत हो जाता है तथा मां पार्वती की भूख शांत होती है।

तत्पश्चात भगवान शिव माया के द्वारा मां पार्वती के शरीर से बाहर आते हैं और पार्वती के धूम से व्याप्त स्वरूप को देखकर कहते हैं कि अबसे आप इस वेश में भी पूजी जाएंगी। इसी कारण मां पार्वती का नाम 'देवी धूमावती' पड़ा। 

पुराणों में अभिशप्त, परित्यक्त, भूख लगना और पति को निगल जाना ये सब सांकेतिक प्रकरण हैं। यह इंसान की कामनाओं का प्रतीक है, जो कभी ख़त्म नहीं होती और इसलिए वह हमेशा असंतुष्ट रहता है। मां धूमावती उन कामनाओं को खा जाने यानी नष्ट करने की ओर इशारा करती हैं।

विशेष : कुछ लोगों का मानना है गृहस्थ लोगों को  इन देवी की साधना नहीं करनी चाहिए। 

इन महाविद्या का स्थायी आह्वाहन नहीं होता अर्थात इन्हे लंबे समय तक घर में स्थापित या विराजमान होने की कामना नहीं करनी चाहिए क्योंकि ये दुःख, क्लेश और दरिद्रता की देवी हैं। 
जप शुरू करने से पहले आवाहन करें और ख़त्म होने पर विसर्जन कर दें। 

आध्यात्मिक शक्ति जगाने में सर्वोत्तम:
महाविद्याएं सब कुछ देने में समर्थ हैं। फिर भी सबका मकसद अलग-अलग है। साधना के समय उसे ध्यान में रखें। धूमावती दारुण विद्या हैं। वे धन से लेकर शत्रुनाश में भी उपयोगी है। लेकिन आध्यात्मिक शक्ति के लिए श्रेष्ठ हैं। उनके रूप में ही असांसारिक भाव है। वे बंधनों से मुक्त कर ऊपर उठाती हैं। अतः साधकों के लिए यही मार्ग बेहतर है।

धूमावती उपासना के प्रमुख मंत्र
सप्ताक्षर मंत्र : धूं धूमावती स्वाहा।

ध्यान : 
येत् कालाभ्रनीलां विकलित वदनां काकनासां विकर्णाम्। संमार्जन्युक सूर्पैयुत मुसलं करां वक्रदंतां विषास्याम्।। 

ज्याष्ठां निर्वाणवेषा प्रकुटित नयनां मुक्तेकेशीमुदाराम्। शुष्कोत्तुंगाति तिर्यक् स्तनभर युगलां निष्कृपां शत्रुहन्त्रीम।।

विनियोग : इस मंत्र के ऋषि नारसिंह हैं। 
पंक्तिछंद: धूमावती देवता हैं। 
धूं बीज, स्वाहा शक्ति: संग शत्रुनिग्रह के लिए जप है।
अंगन्यास : धां, धीं, धूं, धैं, धौं, ध:।

अष्टाक्षर मंत्र
धूं धूं धूमावती स्वाहा। (मेरूतंत्र के अनुसार)।
धूं धूं धूमावति स्वाहा (मंत्रमहोदधौ के अनुसार)।
विनियोग : इस मंत्र के ऋषि पिप्पलाद ऋषि हैं।

अष्टाक्षर मंत्र
धूं धूमावती स्वाहा ठ: ठ:। (शाक्त प्रमोद के अनुसार)।
अंगन्यास : ऊं धां, ऊं धीं, ऊं धूं, ऊं धें, ऊं धौं, ऊं ध:।

दशाक्षर मंत्र
धूं धूं धूं धूमावती स्वाहा।
विनियोग : इस मंत्र के ऋषि स्कंद हैं।
पंक्ति छंद है।
देवता धूमिनी, धूं बीज एवं शक्ति स्वाहा हैं।

चतुर्दशाक्षर मंत्र
धूं धूं धुर धूमावती क्रों फट् स्वाहा।
विनियोग : इस मंत्र के ऋषि क्षपणक है।
गायत्री छंद है।
देवता धूमावती, बीज धूं वशक्ति स्वाहा है।
विशेष-शत्रु के उच्चाटन में प्रयोग अमोघ है।

पंचदशाक्षर मंत्र
(अ) ऊं धूं दूमावति देवदत्त धावति स्वाहा। (देवदत्त के स्थान पर अमूकं पढ़ें। अर्थात जिस शत्रु के लिए कर रहे हों का नाम दें।

(ब) धूं धूं धूं धुरू धूमावति क्रों फट् स्वाहा।

सभी मंत्रों के लिए विधि:
मंत्र जप के लिए पहले संकल्प लें। मंत्रों का एक लाख जप करें। तदनुसार दशांश हवन करें। जप से पहले रोज देवी का पूजन करें। शुभ दिन में साधना शुरू करें। कृष्णपक्ष की चतुर्दशी उपयुक्त दिन है। उस दिन भी उपवास रखकर शुरू कर सकते हैं। जप अवधि में कम से कम बातचीत करें। जितना मौन रहेंगे, अच्छा होगा। मंदिर में हों तो शिवलिंग की भी पूजा करें। अन्यथा शिव बनाकर पूजा करना उचित। धूमावती साधना : शत्रुनाश व धन प्राप्ति में अमोघ है।

Sunday, October 17, 2021

मन्वन्तर और सप्तर्षि

अलग अलग मन्वन्तरों में सप्तर्षि बदल जाते हैं। मनुकाल ही मन्वन्तर कहलाता है। ब्रह्मा जी के एक दिन (कल्प) में चौदह मनु होते हैं। चौदह मनु तथा मनुपुत्र एक-एक कर समस्त पृथ्वी के राजा होकर धर्म पूर्वक प्रजा का पालन करते हैं। मनुओं के नाम के अनुसार ही चौदह मन्वन्तरों के चौदह नाम पड़े हैं। इन चौदह मनुओं में प्रथम मनु का नाम स्वायम्भुव मनु है ।

भगवान विष्णु के नाभिपद्म से चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने आविर्भूत होकर मैथुनी सृष्टि के संकल्प को लेकर अपने ही शरीर से स्वायम्भुव मनु तथा महारानी शतरूपा को प्रकट किया। ये आदि मनु ही प्रथम मनु हैं, जिनके नाम से स्वायम्भुव मन्वन्तर पड़ा। कल्पभेद से मन्वन्तरों के नाम में भी अंतर मिलता है।

(महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं। एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली में पाँच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं। कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है। )

प्रत्येक मन्वन्तर में सप्तर्षि भिन्न-भिन्न नाम रूपों से अवतरित होते हैं। पुराणों में इसका विस्तार से वर्णन मिलता है। उदाहरण के रूप में विष्णु पुराण में चौदह मन्वन्तरों के सप्तर्षियों का नाम दिए गए हैं।

इस प्रकार चौदह मन्वन्तरों में सप्तर्षियों का परिगणन पृथक पृथक नाम - - रूपों में हुआ है। इन ऋषियों की अपार महिमा है, ये सभी तपोधन हैं।

ऋषियों ने वेदमंत्रों का दर्शन किया है, इसीलिए 'ऋषयो मंत्रद्रष्टारः' कहा गया है। 
ऋषि कौन हैं? इसकी व्याख्या में बताया गया है कि ऋषि वेदमंत्रों के द्रष्टा और स्मर्ता हैं। इसीलिए वेदों को अपरुषेय कहा गया है।

यह वैदिक सिद्धांत है कि वेद का अध्ययन ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग के अधिष्ठान के साथ करना चाहिए। आचार्य शौनक कहते हैं:

एतान्यविदित्वा योऽधीतेऽनुब्रूते जपति जुहोति यजते याजयते तस्य ब्रह्म निर्वीर्यं यातयामं भवति...। (अनुक्रमणी १ / १)

अर्थात जो मनुष्य ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग को जाने बिना वेद का अध्ययन, अध्यापन, जप, हवन, यजन, याजन आदि करते हैं उनका वेदाध्ययन निष्फल तथा दोषयुक्त होता है।

इसप्रकार ऋषियों के स्मरण की विशेष महिमा है। प्रातः काल जगने के अनन्तर ऋषियों के नाम - स्मरणपूर्वक उनके मंगल की कामना की जाती है।

भृगुवाशिष्ठः क्रतुरङ्गिराश्च,
मनुः पुलस्त्यः पुलहश्च गौतमः ।
रेभ्योः मरीचिश्च्यवनश्च दक्षः,
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥ – वामनपुराण

वेदों में तो सप्तर्षियों की महिमा का बार - बार प्रख्यापन हुआ है। वहां सात संख्या का परिगणन ऋषियों के एक विशेष वर्ग के लिए हुआ है।

ब्रम्हर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि तथा रजर्षि - इन सात रूपों में भी ऋषियों का विभाजन है। जैसे ४९ मरुद् देवताओं का सात - सात का वर्ग है, वैसे ही ऋषियों में भी सात ऋषियों के वर्ग हैं, जो सप्तर्षि कहलाते हैं। सात की संख्या की विशेष महिमा है। इस ब्रह्मांड में सात लोक ऊपर और सात लोक नीचे हैं, सात ही सागर हैं, वेद के गायत्री, उष्णिक् आदि सात छन्द ही मुख्य हैं, भगवान सूर्य सप्तश्ववाहन कहे जाते हैं। यजुर्वेद के एक मंत्र में सात की संख्या का विशेष परिज्ञान कराया गया है।

"सप्त ते अन्गे समिधः सप्त जिह्वाः" - यजुर्वेद १७/७९

उपनिषद के एक मंत्र में भी सात की संख्या का अवबोधन कराया गया है।

सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्, सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा, गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ - मुण्डकोपनिषद २/१/८ 

यज्ञ में छंदोमय सात परिधियाँ तथा सात •सात की संख्या में समिधाएं बताई गई हैं।

"सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृतः" (यजुर्वेद ३१/१५)

सप्तशती तथा सप्ताह आदि में भी सप्त पद निहित है।

प्रातः स्मरण के एक मांगलिक श्लोक में सप्तर्षियों तथा सात सात की संख्या वाले पदार्थों से प्रभात को सुप्रभात बनाने की प्रार्थना की गई है -

सप्त स्वराः सप्त रसातलानि, 
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम

सप्तार्णवाः सप्त कुलाचलाश्च, 
सप्तर्षयो द्वीपवनानि सप्त।

भूरादिकृत्वा भुवनानि सप्त, 
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम॥ 
- वामनपुराण

अर्थात षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत तथा निषाद- ये सप्त स्वर, अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल तथा पाताल, ये सात अधोलोक सभी मेरे प्रातःकाल को मंगलमय करें। सातों समुद्र, सातों कुलपर्वत, सप्तर्षिगण, सातों वन तथा सातों द्वीप, भूलोक, भुवर्लोक आदि सातों लोक, सभी मेरे प्रातः काल को मंगलमय करें।

इसी आशय से ऋषियों की सात की संख्या को लेकर एक विशेष वर्ग हैं, जो सप्तर्षि कहलाता है।

सप्तर्षियों की आराधना - वेदों के अनेक मंत्रों में सप्तर्षियों की प्रार्थना की गई है। तर्पण में नित्य ऋषितर्पण तथा श्रावणी के दिन ऋषियों का तर्पण तथा विशेष पूजन होता है। वेदों में प्राप्त सप्तर्षियों की प्रार्थना के मुख्य मंत्र का भाव यह है कि सप्तर्षिगण सूक्ष्म रूप से इस देह में भी विद्यमान रह कर देव रूप होकर इसका संचालन करते हैं। ये सात ऋषि प्राण, त्वचा, चक्षु, श्रवण, रसना, घ्राण तथा मन रूप से देह में स्थित रहते हैं और सुषुप्तिकाल में देह में व्याप्त रहते हुए भी हृदयाकाश स्थित विज्ञानात्मक ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाते हैं-

सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे सप्त रक्षन्ति सदमप्रमादम् । सप्तापः स्वपतो लोकमीयुस्तत्र जागृतो अस्वप्नजौ सत्रसदौ च देवौ ।।

यजुर्वेद ३४/५५

इसके साथ ही यजुर्वेद १३/५४- ५८ में सप्तर्षियों के पूजन में मंत्र आये हैं। भाद्रपद शुक्ल पंचमी ऋषिपंचमी के नाम से विख्यात है, इस दिन इनकी विशेष पूजा आराधना की जाती है तथा सातों ऋषियों की पृथक पृथक यथाशक्ति स्वर्णादि की प्रतिमा बनाकर उनकी पूजा की जाती है।

अरुन्धतीसहितसप्तऋर्षिभ्यो नमः" इस नाम मंत्र से भी एक साथ यजन किया जा सकता है। इनके ध्यान में बताया गया है कि ये ऋषिश्रेष्ठ ब्रह्मतेज और करोड़ो सूर्यों की आभा से सम्पन्न हैं।

कश्यपोऽत्रिरर्भरद्वाजो विश्वामित्रऽथ गौतमः । 
जमदग्निर्वसिष्ठश्च अरुन्धत्या सहाष्टकाः।। 

मूर्ति ब्रह्मण्यदेववर्षेर्बह्मण्यं तेज उत्तमम् । सूर्यकोटिप्रतिकाशमृषिवृन्दं विचिन्तयेत् ।। 
- वर्षकृत्यदीपक

कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि तथा वशिष्ठ - ये वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर के सप्तर्षि हैं। महर्षि वशिष्ठ जी के साथ उनकी धर्मप्राणा देवी अरुंधति भी साथ में ही सप्तर्षिमण्डल में स्थित रहती हैं। महाभागा अरुंधति के पातिव्रत्य की अपार महिमा है, इसी के बल पर ये सदा वशिष्ठ जी के साथ रहती हैं। सप्तर्षियों के साथ देवी अरुंधति का भी पूजन होता है। अखंड सौभाग्य तथा श्रेष्ठ दाम्पत्य के लिए इनकी आराधना होती है।

आकाश में सप्तर्षिमण्डल कहाँ स्थित है, इस विषय में श्रीमद्भागवत ५/२२/१७ में बताया गया है कि नवग्रहों के लोकों से ऊपर ग्यारह लाख योजन की दूरी पर कश्यप आदि सप्तर्षि दिखाई देते हैं। ये सब लोकों की मंगलकामना करते हुए भगवान विष्णु के परम् ध्रुवलोक की प्रदक्षिणा किया करते हैं।

तत उत्तरस्मादृषय एकादशलक्षयोजनान्तर उपलभ्यन्ते ।
य एव लोकानां शमनुभावयन्तो भगवतो विष्णोर्यत्परमं पदं प्रदक्षिणं प्रक्रमन्ति ॥

आकाश में सप्तर्षिमण्डल के उत्तर में ध्रुवलोक स्थित है। इसप्रकार सप्तर्षिमण्डल में स्थित रहकर ये सप्तर्षिगण जीवों के शुभाशुभ कर्मों के साक्षी बनते हैं और भगवान की अवतरण लीला में सहयोगी बनते हैं। भगवान श्री राम आदि की लीला में महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम तथा " अत्रि आदि ऋषि सहयोगी रहे हैं। ऐसे ही अन्य अवतारों में भी ऋषिगण भगवान की भक्ति करते हैं और उनके कृपाप्रसाद से जगत के कल्याण कार्य में सतत चेष्टारत रहते हैं। भगवान के लीलासंवरण के अनन्तर भी ये उनके द्वारा प्रतिपादित धर्म की मर्यादा को सुरक्षित रखने के लिए कल्पपर्यंत बने रहते हैं और पुनः अवतरित होते हैं।

Thursday, September 30, 2021

सप्तर्षियों का अवतरण

“नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः।।”

- मुण्डकोपनिषद २/३/११

'परम् ऋषियों को नमस्कार है, परम् ऋषियों को नमस्कार है।'

सप्तर्षियों का प्रादुर्भाव श्री ब्रह्मा जी के मानस संकल्प से हुआ है। सृष्टि के विस्तार के लिए ब्रह्मा जी ने अपने ही समान दस मानस पुत्रों को उत्पन्न किया। उनके नाम हैं- मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, दक्ष तथा नारद ।

मरीचित्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
भृगुर्वसिष्ठो दक्षश्च दशमस्तत्र नारदः ॥ 
- श्रीमद्भागवत महापुराण ३/१२/२२

ये ऋषि गुणों में ब्रह्मा जी के समान ही हैं, अतः पुराणों में ये नौ ब्रह्मा भी कहें गए हैं। 

– “नव ब्राह्मण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः ॥” 
(विष्णु पुराण १/७/६)

विष्णुपुराण (१/७/५) में नारद जी का नाम पृथक लिया गया है और नौ की गणना हुई है।

भृगुं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुमङ्गिरसं तथा । 
मरीचिं दक्षमत्रिं च वसिष्ठं चैव मानसम् ॥

यही आदि ऋषि - सर्ग है। ये ही ऋषि भिन्न भिन्न मन्वन्तरों* में - नामभेद से सप्तर्षियों के रूप में अवतरित होते रहते हैं।

श्रीमद्भागवत में श्री सूत जी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं कि ऋषि, मनु, देवता, प्रजापति, मनुपुत्र और जितने भी शक्तिशाली हैं, वे सब के सब भगवान श्री हरि के अंशावतार अथवा कलावतार हैं।

ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजसः । 
कलाः सर्वे हरेरेव सप्रजापतयस्तथा ॥ 
- श्रीमद्भागवत १/३/२७

इस प्रकार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र सप्तर्षिगण भी भगवान के ही अवतार हैं। सप्तर्षियों का परिगणन भगवद्भूतियों में हुआ है।

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । 
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्॥ 
-गीता १०/ ४१

इन ऋषियों का प्रादुर्भाव ब्रह्मा जी के मानसिक संकल्प से उनके अनेक अंगों से हुआ है, अतः यह ऋषिसृष्टि मानससृष्टि या अंगिकसृष्टि अथवा सांकल्पित सृष्टि भी कहलाती है।

इनमें नारद जी प्रजापति ब्रह्मा की गोद से, दक्ष अंगूठे से, वशिष्ठ प्राण से, भृगु त्वचा से, क्रतु हाथ से, पुलह नाभि से, पुलस्त्य कानों से, अंगिरा मुख से, अत्रि नेत्रों से और मरीचि मन से उत्पन्न हुए।

उत्सङ्गान्नारदो जज्ञे दक्षोऽङ्गुष्ठात्स्वयम्भुवः ।
प्राणाद्वसिष्ठः सञ्जातो भृगुस्त्वचि करात्क्रतुः ॥

पुलहो नाभितो जज्ञे पुलस्त्यः कर्णयोः ऋषिः । अङ्गिरा मुखतोऽक्ष्णोऽत्रिः मरीचिर्मनसोऽभवत् ॥ 
- श्रीमद्भ० ३/१२/२३-२४

ब्रह्मा जी से प्रादुर्भूत ऋषियों की इस सृष्टि को पुराणों में ऋषिसर्ग कहा गया है। प्रकारांतर से ये ऋषि ब्रह्माजी के ही आत्मरूप, अंशरूप हैं और उन्ही के अवतार हैं। 

सृष्टि के विस्तार तथा उसके रक्षण में इन ऋषियों का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक मन्वन्तर में नामभेद से ये ही ऋषि सप्तर्षि होकर महाप्रलय में चराचर के सूक्ष्मतम स्वरूप और वनस्पतियों तथा औषधियों को बीज रूप में धारण कर विद्यमान रहते हैं, प्रलय में भी ये बने रहते हैं और पुनः नई सृष्टि में उसका विस्तार करते हैं।
इस प्रकार से सप्तर्षिगण जीवों पर महान कृपा करते हैं। कदाचित ये स्थूल सृष्टि के सत्त्वांश और चैतन्यांश को धारण कर प्रलयकाल में सुरक्षित न रखते तो नवीन सृष्टि पुनः होना कठिन होती।

ये ऋषि भगवान के अनन्य भक्त हैं और उन्ही के कृपा प्रसाद से समर्थ होकर जीवों का कल्याण करते रहते हैं। ये एक रूप से नक्षत्रलोक में सप्तर्षिमण्डल में स्थित रहते हैं और दूसरे रूप में तीनों लोकों में विशेष रूप से भूलोक में स्थित रह कर लोगों धर्माचरण तथा सदाचरण की शिक्षा देते हैं तथा ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, तप, भगवत्प्रेम, सत्य, परोपकार, क्षमा, अहिंसा आदि सात्विक भावों की प्रतिष्ठा करते हैं।

प्रति चार युग (सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलि) बीतने पर 'वेदविप्लव' होता है। इसीलिए सप्तर्षिगण भूतल पर अवतीर्ण होकर वेद का उद्धार करते हैं। सप्तर्षिमण्डल आकाश में सुप्रसिद्ध ज्योतिर्मंडलों में है। इसके अधिष्ठाता ऋषिगण लोक में ज्ञान परंपरा को सुरक्षित रखते हैं। अधिकारी जिज्ञासु को प्रत्यक्ष या परोक्ष, जैसा वह अधिकारी हो, तत्वज्ञान की ओर उन्मुख कर के मुक्तिपथ में लगाते हैं।

ये सभी ऋषि कल्पान्तचिरजीवी, त्रिकालदर्शी, मुक्तात्मा और दिव्य देहधारी होते हैं। ये स्थितप्रज्ञ तथा अतिन्द्रीयद्रष्टा हैं। पुराणों में इन्हें ब्रह्मवादी और गृहमेधी कहा गया है (वायुपुराण)। गृहस्थ होते हुए भी ये मुनिवृत्ति से रहते हैं। ये सत्य, धर्म, ज्ञान, शौच, संतोष और ब्रह्मतेज से सम्पन्न होते हैं। यज्ञों द्वारा देवताओं का आप्यायन और नित्य स्वाध्याय इनकी मुख्य चर्या रहती है।

Thursday, July 8, 2021

18 chapters… in one single line each

It's not a book applicable to only one particular religion. There was no proper concept of religion when Geeta was written.
It's a holy book for the mankind. Geeta provides you divine knowledge & enlightenment to lead your life.

Each time I read,I get different meanings about life depending on my current situation.Moreover I'm a great lover of Lord Krishna. It's him who attracted me to read this book.

It changed my life to a positive side. I stopped worrying about the past. I'm addicted to this book whenever I feel low. I always found solution to my problem (I randomly open a page when I'm at the peak of grief). 

People may come in your life and go. But there is a permanent friend and companion sitting in your heart, waiting to be recognised, which will never leave you, realising this, we attain the highest form of peace and realise God. 

When we realise that highs and lows in life are the impermanent appearance of happiness and distress and their disappearance in due course are like the appearance and disappearance of winter and summer seasons, we become peaceful. 

Let’s start exploring the untold ones, one snippet from each chapter (18).. read it very carefully, it summarizes one chapter each till 18th... 

▪︎Chapter 1
•Wrong thinking is the only problem in life

▪︎Chapter 2

•Right knowledge is the ultimate solution to all problems

▪︎Chapter 3

•Selflessness is the only way to progress and prosperity

▪︎Chapter 4

•Every act can be an act of prayer

▪︎Chapter 5
•Renounce the ego of individuality and rejoice in the bliss of infinity.

▪︎Chapter 6
•Connect to the higher consciousness daily.

▪︎Chapter 7
•Live what you learn.

▪︎Chapter 8
•Never give up on yourself.

▪︎Chapter 9
•Value your blessings.

▪︎Chapter 10
•See divinty all around.

▪︎Chapter 11
•Have enough surrender to see the truth as it is.

▪︎Chapter 12
•Absorb your heart and mind in the supreme Lord.

▪︎Chapter 13
•Detach from Maya and attach to divine.

▪︎Chapter 14
•Live a lifestyle that matches your vision.

▪︎Chapter 15
•Give priority to divinity.

▪︎Chapter 16
•Being good is a reward in itself.

▪︎Chapter 17
•Choosing the right over pleasant is a sign of power..

▪︎Chapter 18
•Let's go ,let's move , let's move to Union with god. 

Studying Gita is the “best move” played in one's life.

Tell your friends & family to read it, there is no harm in spreading positivism and knowledge.

Harey krishna 🙏🚩

Thursday, March 11, 2021

SHIVRATRI VRAT & Importanacre of Belpatra

SHIVRATRI VRAT & Importanacre of Belpatra:-

Actually there are twelve Shivratri's in one calendar year. As per shastras the Chaturdeshi tithi of every krishnpaksh is Shivratri. But the one falling in the month of Magh is the most auspicious. The devotees usually fast the whole day and perform the ritualistic puja four times in the night.

As per Shivpuran once Brahma, Vishnu and Parvati asked Shiva about his favourite puja that made him the most happiest.

Shiva mentioned ten vrats,but his most favoured vrat was Shivratri. The rituals should be performed four times as mentioned in Shivpuran. You have to prepare a parthiv or mud lingam and establish (staphna it with the chanting of Panchakshar mantra of Om Namah Shivay.

Follow it up with the sixteen step(Shodshhopchar/ षोड्षोपचार) puja right from bathing, offerings of flowers, dhoop, deep and naivedya. This shivling has to be worshipped four times and at the end of the night, it has to submerged in river,tank or pond.

There is an elaborate mention of all the offerings to be made seperately with different items for four times in Shivpuran. In the earliest puja use of Panchamrit, Chandan, Rice, Black sesame, lotus, Red flower of Kaner should be offered with seperate mantra for each offering.

In the next puja add oats or jao, double the Lotus flowers  and make a prasad of Ghee, Honey and Milk and chant along Om Namah Shivay after every offering.

In the third puja add Wheat made food, Madaar flower, Dhoop, Deep, Naivedya along with camphor.

In the fourth puja apart from lentils also add seven types of Foodgrains, Sweets, Fruits like Pomegranate and banana. Increase the number of chants.

In each puja you compulsarily have to offer Bilva leaves(बेल पत्र).

Finish the puja by feeding  Brahmins.

The importance of four time Puja is explained in the story of the deers and a Bhil named Gurudruh.

This Bhil Gurudruh was very cruel and did not hesitate to perform any sinful activity. He lived with his parents in abject poverty doing petty crimes.On feeling hungry, his parents asked him to get something to eat. The Bhil carried his bow and arrow and left for the forest to hunt for some wild animal. He waited for his prey from morning to sunset but was not successful. Tired,he went near a pond to take some water and carried it with him.He climbed a Bilva(बेल) tree nearby and sat waiting for his prey to come near the pond as he was sure some animal would surely come there to drink water. Unknown to him a shivling stood under the tree. Atlast a buck doe(she- deer) came along to drink water. Immediately the Bhil raised his hand to kill the deer with his arrow. During this activity some Bilva leaves(बेल पत्र) and few drops of water fell on the Shivling. This reduced his number of sins unknown to him.

The deer, smelling a hunter, became alert. He pleaded with the Bhil to let her go for now,but she would definitely return to be killed after she handed her children to her sister and she left.

After sometime the sister deer happened to come there.Again this Bhil picked up his bow and arrow to strike her, Resulting in few Bilva leaves falling and a few drops of water spilling on the shivling. Thus reducing more sins of this Bhil. This deer too pleaded to be allowed and hand over her son to the husband.Her plea was convincing enough to be allowed to go and return back.

The Bhil once again waited for his prey to arrive. The husband deer also came there in search of water. Once again as the Bhil picked up his bow and arrow to strike again a few Bilva leaves and droplets of water fell on the lingam. More sins were reduced. This deer also sensed the danger and pleaded before the Bhil to be allowed to go home in order to arrange for the children to be sent to relatives. Again the convinced Bhil allowed him to go and return.

Interestingly all the three deers met on the way. They all discovered that all the three were facing the same danger.
Ultimately they said that one of them had to die so let us face the ordeal. All of them were ready to sacrifice themselves first.So they all came together  towards the pond. The Bhil saw the deer family arriving again he raised his hands to strike them which again resulted in few Bilva leaves falling and and drops of water falling on the lingam.

But a miracle occurred.

Instead of killing them he left them free since good sense prevailed on him due to his doing the Shivling Puja four times, the day was Shivratri. All his sins were destroyed. Shivji himself came to bless him and was granted a boon that resulted in his becoming the King of that state.

Therefore it is stressed again and again that you should pray four times in the Shivratri night.

Source - Shiv puran ,Ling puran and Skanda puran

Saturday, March 6, 2021

हिंदू परम्पराओं में विज्ञान कैसे जुड़ा है?

 

एक दिन डिस्कवरी पर जेनेटिक बीमारियों से सम्बन्धित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम देख रहा था ... उस प्रोग्राम में एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा की जेनेटिक बीमारी न हो इसका एक ही इलाज है और वो है "सेपरेशन ऑफ़ जींस".. मतलब अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नही करना चाहिए ..क्योकि नजदीकी रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नही हो पाता और जींस लिंकेज्ड बीमारियाँ जैसे हिमोफिलिया, कलर ब्लाईंडनेस, और एल्बोनिज्म होने की १००% चांस होती है ..

फिर मुझे बहुत ख़ुशी हुई जब उसी कार्यक्रम में ये दिखाया गया की आखिर हिन्दूधर्म में हजारों सालों पहले जींस और डीएनए के बारे में कैसे लिखा गया है?

हिंदुत्व में कुल सात गोत्र होते है और एक गोत्र के लोग आपस में शादी नही कर सकते ताकि जींस सेपरेट (विभाजित) रहे.. उस वैज्ञानिक ने कहा की आज पूरे विश्व को मानना पड़ेगा की हिन्दूधर्म ही विश्व का एकमात्र ऐसा धर्म है जो "विज्ञान पर आधारित" है !

हिंदू परम्पराओं से जुड़े ये वैज्ञानिक तर्क:

1- कान छिदवाने की परम्परा:

भारत में लगभग सभी धर्मों में कान छिदवाने की परम्परा है।

वैज्ञानिक तर्क- दर्शनशास्त्री मानते हैं कि इससे सोचने की शक्त‍ि बढ़ती है। जबकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित रहता है।

2-: माथे पर कुमकुम/तिलक

महिलाएं एवं पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते हैं।

वैज्ञानिक तर्क- आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है। कुमकुम या तिलक लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है। माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है। इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता

3- : जमीन पर बैठकर भोजन

भारतीय संस्कृति के अनुसार जमीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है।

वैज्ञानिक तर्क- पाल्थी मारकर बैठना एक प्रकार का योग आसन है। इस पोजीशन में बैठने से मस्त‍िष्क शांत रहता है और भोजन करते वक्त अगर दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है। इस पोजीशन में बैठते ही खुद-ब-खुद दिमाग से एक सिगनल पेट तक जाता है, कि वह भोजन के लिये तैयार हो जाये।

4- : हाथ जोड़कर नमस्ते करना

जब किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते अथवा नमस्कार करते हैं।

वैज्ञानिक तर्क- जब सभी उंगलियों के शीर्ष एक दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दबाव पड़ता है। एक्यूप्रेशर के कारण उसका सीधा असर हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है, ताकि सामने वाले व्यक्त‍ि को हम लंबे समय तक याद रख सकें। दूसरा तर्क यह कि हाथ मिलाने (पश्च‍िमी सभ्यता) के बजाये अगर आप नमस्ते करते हैं तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु आप तक नहीं पहुंच सकते। अगर सामने वाले को स्वाइन फ्लू भी है तो भी वह वायरस आप तक नहीं पहुंचेगा।

5-: भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से

जब भी कोई धार्मिक या पारिवारिक अनुष्ठान होता है तो भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से होता है।

वैज्ञानिक तर्क- तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। इससे पाचन तंत्र ठीक तरह से संचालित होता है। अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है। इससे पेट में जलन नहीं होती है।

6-: पीपल की पूजा

तमाम लोग सोचते हैं कि पीपल की पूजा करने से भूत-प्रेत दूर भागते हैं।

वैज्ञानिक तर्क- इसकी पूजा इसलिये की जाती है, ताकि इस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़े और उसे काटें नहीं। पीपल एक मात्र ऐसा पेड़ है, जो रात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता है।

7-: दक्ष‍िण की तरफ सिर करके सोना

दक्ष‍िण की तरफ कोई पैर करके सोता है, तो लोग कहते हैं कि बुरे सपने आयेंगे, भूत प्रेत का साया आ जायेगा, आदि। इसलिये उत्तर की ओर पैर करके सोयें।

वैज्ञानिक तर्क- जब हम उत्तर की ओर सिर करके सोते हैं, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है। शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा दिमाग की ओर संचारित होने लगता है। इससे अलजाइमर, परकिंसन, या दिमाग संबंधी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। यही नहीं रक्तचाप भी बढ़ जाता है।

8-सूर्य नमस्कार

हिंदुओं में सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परम्परा है।

वैज्ञानिक तर्क- पानी के बीच से आने वाली सूर्य की किरणें जब आंखों में पहुंचती हैं, तब हमारी आंखों की रौशनी अच्छी होती है।

9-सिर पर चोटी

हिंदू धर्म में ऋषि मुनी सिर पर चुटिया रखते थे। आज भी लोग रखते हैं।

वैज्ञानिक तर्क- जिस जगह पर चुटिया रखी जाती है उस जगह पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं। इससे दिमाग स्थ‍िर रहता है और इंसान को क्रोध नहीं आता, सोचने की क्षमता बढ़ती है।

10-व्रत रखना

कोई भी पूजा-पाठ या त्योहार होता है, तो लोग व्रत रखते हैं।

वैज्ञानिक तर्क- आयुर्वेद के अनुसार व्रत करने से पाचन क्रिया अच्छी होती है और फलाहार लेने से शरीर का डीटॉक्सीफिकेशन होता है, यानी उसमें से खराब तत्व बाहर निकलते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत करने से कैंसर का खतरा कम होता है। हृदय संबंधी रोगों, मधुमेह, आदि रोग भी जल्दी नहीं लगते।

11-चरण स्पर्श करना

हिंदू मान्यता के अनुसार जब भी आप किसी बड़े से मिलें, तो उसके चरण स्पर्श करें। यह हम बच्चों को भी सिखाते हैं, ताकि वे बड़ों का आदर करें।

वैज्ञानिक तर्क- मस्त‍िष्क से निकलने वाली ऊर्जा हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए एक चक्र पूरा करती है। इसे कॉसमिक एनर्जी का प्रवाह कहते हैं। इसमें दो प्रकार से ऊर्जा का प्रवाह होता है, या तो बड़े के पैरों से होते हुए छोटे के हाथों तक या फिर छोटे के हाथों से बड़ों के पैरों तक।

12-क्यों लगाया जाता है सिंदूर

शादीशुदा हिंदू महिलाएं सिंदूर लगाती हैं।

वैज्ञानिक तर्क- सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी होता है। यह मिश्रण शरीर के रक्तचाप को नियंत्रित करता है। चूंकि इससे यौन उत्तेजनाएं भी बढ़ती हैं, इसीलिये विधवा औरतों के लिये सिंदूर लगाना वर्जित है। इससे स्ट्रेस कम होता है।

13- तुलसी के पेड़ की पूजा

तुलसी की पूजा करने से घर में समृद्ध‍ि आती है। सुख शांति बनी रहती है।

वैज्ञानिक तर्क- तुलसी इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है। लिहाजा अगर घर में पेड़ होगा, तो इसकी पत्त‍ियों का इस्तेमाल भी होगा और उससे बीमारियां दूर होती हैं।

14- आरती के समय ताली बजाना 

हम किसी भी मंदिर में आरती के समय सभी को ताली बजाते देखते हैं और खुद भी ताली बजाना शुरू कर देते हैं।

वैज्ञानिक तर्क- ताली में बाएं हाथ की हथेली पर दाएं हाथ की चारों अंगुलियों को एक साथ तेज दबाव के साथ इस प्रकार मारा जाता है कि दबाव पूरा हो और आवाज अच्छी आये , इस प्रकार की ताली से बाएं हथेली के फेफड़े, लीवर, पित्ताशय, गुर्दे, छोटी आंत व बड़ी आंत तथा दाएं हाथ की अंगुली के साइनस के दबाव बिंदु दबते हैं। इससे इन अंगों तक खून का प्रवाह तीव्र होने लगता है। इस तरह की ताली को तब तक बजाना चाहिए, जब तक हथेली लाल न हो जाए।

अगर हिंदू परम्पराओं से जुड़े ये वैज्ञानिक तर्क आपको वाकई में पसंद आये हैं, तो इस लेख को शेयर कीजिये, ताकि आगे से कोई भी इस परम्परा को गलती से भी न तोड़ें।

Saturday, February 27, 2021

साईं बाबा की सच्चाई !!!!

 साईं बाबा की सच्चाई

कृपया ध्यान दें :–

प्रस्तुत लेख का मंन्तव्य साँई के प्रति आलोचना का नही बल्कि उनके प्रति स्पष्ट जानकारी प्राप्त करने का है। लेख मेँ दिये गये प्रमाणोँ की पुष्टि  “साँई सत्चरित्र” से करेँ, जो लगभग प्रत्येक साईँ मन्दिरोँ मेँ उपलब्ध है ओर शिर्डी साई मंदिर द्वारा प्रकाशित की गई हे । यहाँ पौराणिक तर्कोँ के द्वारा भी सत्य का विश्लेषण किया गया है।

मेहनत कर के साँई सत्चरित्र के पुरे 1 से 51 अध्याय पढ़ तथा समझ कर इस लेख को लिखा है, विनती है  कृपया पूरा लेख संयम से अंत तक जरुर पढ़े ! धन्यवाद !


आजकल आर्यावर्त  मेँ तथाकथित भगवानोँ का एक दौर चल पड़ा है। यह संसार अंधविश्वास और तुच्छ ख्याति- सफलता के पीछे भागने वालोँ से भरा हुआ है।
“यह विश्वगुरू आर्यावर्त का पतन ही है कि आज परमेश्वर की उपासना की अपेक्षा लोग गुरूओँ, पीरोँ और कब्रोँ पर सिर पटकना ज्यादा पसन्द करते हैँ।”

आजकल सर्वत्र साँई बाबा की धूम है, कहीँ साँई चौकी, साँई संध्या और साँई पालकी मेँ मुस्लिम कव्वाल साँई भक्तोँ के साथ साँई जागरण करने मेँ लगे हैँ। मन्दिरोँ मेँ साँई की मूर्ति सनातन काल के देवी देवताओँ के साथ सजी है। मुस्लिम तान्त्रिकोँ ने भी अपने काले इल्म का आधार साँई बाबा को बना रखा है व उनकी सक्रियता सर्वत्र देखी जा सकती है।

कोई इसे  विष्णुजी  का ,कोई शिवजी  का तथा कोई दत्तात्रेयजी  का अवतार बताता है ।
परन्तु साँई बाबा कौन थे? 
उनका आचरण व व्यवहार कैसा था? 
इन सबके लिए हमेँ निर्भर होना पड़ता है “साँई सत्चरित्र” पर!

Click on the above image to download this book 

कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीँ जो रामायण व महाभारत का नाम न जानता हो? ये दोनोँ महाग्रन्थ क्रमशः श्रीराम और कृष्ण के उज्ज्वल चरित्र को उत्कर्षित करते हैँ, उसी प्रकार साईँ के जीवनचरित्र की एकमात्र प्रामाणिक उपलब्ध पुस्तक है- “साँईँ सत्चरित्र”॥

इस पुस्तक के अध्ययन से साईँ के जिस पवित्र चरित्र का अनुदर्शन होता है, क्या आप उसे जानते हैँ?

चाहे चीलम/तम्बाकू/बीडी  पीने की बात हो, 
चाहे स्त्रियोँ को अपशब्द कहने की?, 
चाहे बातबात पर क्रोध करने की, 
चाहे माँसाहार की बात हो, 
या चाहे धर्मद्रोही, देशद्रोही व इस्लामी कट्टरपन की….

इन सबकी दौड़ मेँ शायद ही कोई साँई से आगे निकल पाये। यकीन नहीँ होता न?
तो आइये चलकर देखते हैँ…साईं के 95% से अधिक भक्तों ने “साँईँ सत्चरित्र” नही पढ़ी है, वे केवल देखा देखी में इस बाबे के पीछे हो लिए!

मे आपको दिखाता हु सत्य क्या है। 

निम्न  प्रति साँईँ सत्चरित्र अध्याय 1 की है ! इसे ध्यान से पढ़े :—

जब इतना अधिक सम्मान दिया गया है तो इसकी जाँच भी करनी आवश्यक  है !

इसी किताब में बताया गया है की बाबा के माता  पिता,जन्म स्थान किसी को ज्ञात नही । इस सम्बन्ध में बहुत छान बिन की गई । बाबा से व अन्य लोगो से पूछ ताछ की गई पर कोई सूत्र हाथ नही लगा ।  यथार्थ में हम लोग इस इस विषय में सर्वथा अनभिज्ञ (unaware) है । 

16 वर्ष की आयु में सर्वप्रथम दिखाई पड़े  (साँईँ सत्चरित्र अध्याय 4) ।

कोई भी निश्चयपूर्वक यह नही जनता की वे किस कुल में जन्मे और उनके उनके माता पिता कोन  थे !  (साँईँ सत्चरित्र अध्याय 38 )

जिस व्यक्ति के बारे में आप सर्वथा अनभिज्ञ है और वे किस कुल में जन्मे और उनके माता पिता कोन  थे – कुछ पता नही !
फिर उसका गौत्र कैसे लिख दिया आपने ??

पहले ही पन्ने पर झूठ  !!!……. झूठ नं 1 

इससे स्पष्ट है की मस्जिद में रहने वाले एक अनाथ साईं को जबरदस्ती प्रमोट किया गया । न की केवल सनातनी देवी देवताओं के साथ इसका नाम लिखा गया अपितु श्री गणेश, वेद माता सरस्वती तथा ब्रह्मा विष्णु महेश के तुल्य बना  दिया गया । जबरदस्ती महर्षि भारद्वाज के कुल में पैदा किया गया।

अब बस आप देखते जाईये !!!

अब जरा सोचे जिसके माता पिता, कुल, प्रारंभिक शिक्षा आदि सभी पर प्रश्न चिन्ह लगा हो जो सर्वथा अनाथ हो, 16 वर्ष की आयु में इधर उधर धूमते पाया गया हो ! उसे भगवान कह देना कहाँ तक सही है ?? जबकी इसका जीवन पूर्णतया कर्मशून्य था ! इसी लेख में आप आगे देखेंगे !

एक और महाझूठ:— 
बाबा 16 वर्ष की आयु में सर्वप्रथम दिखाई पड़े  (साँईँ सत्चरित्र अध्याय 4) ।
निम्न प्रति साँईँ सत्चरित्र अध्याय 4 की है !


उपरोक्त में यह भी लिखा है “वह  16 वर्ष की आयु में ब्रह्मज्ञानी था व किसी लोकिक पदार्थ की इच्छा न थी, और भी बहुत बड़ाई की गई है ! “- इसे भी आगे हल करेंगे

जब पहले-पहल बाबा  शिर्डी में आए थे तो उस समय उनकी आयु केवल 16 वर्ष की थी ! वे शिर्डी में 3 वर्ष तक रहने के पश्चात कुछ समय के लिए अंतर्धान हो गये।

कुछ समय उपरांत वे ओरंगाबाद (निजाम  स्टेट ) में प्रकट हुए और चाँद पाटिल के बारात साथ पुनः शिर्डी पधारे । उस समय उनकी आयु 20 की थी । (अध्याय  10 )

16 वर्ष आयु में दिखे, 3 वर्ष शिर्डी में रहे
16 +3 =19 वर्ष ।
19 वर्ष की आयु में फिर कहीं निकल गये ।
और जब बारात के साथ आए तो आयु 20 वर्ष थी ।  मतलब पुरे 1 वर्ष (365-366 दिन) गायब रहे ।

“19 वर्ष की आयु में गायब रहे” -ये बात याद रखना भाइयों ! 

बारात के साथ किस प्रकार आये इसका वर्णन निम्न प्रकार से है :–
निम्न प्रति साँईँ सत्चरित्र अध्याय 5  की है ध्यान  से पढ़े :–


उपरोक्त वर्णन में 19 वर्ष के युवक को फ़क़ीर, मानव, व्यक्ति कहा गया है !  ………झूठ नं 2 

उपरोक्त से यह भी स्पष्ट है की बाबा 19 वर्ष की आयु में चिलम पिना  सिख गया और सारी  नाटक बाजी करना भी ,पहले खुद पि फिर चाँद पाटिल को भी पिलाई !

वे अपनी युवावस्था में चिलम के अतिरिक्त कुछ संग्रह(इकठ्ठा)  न किया करते थे {अध्याय 48}
मस्जिद में पड़े बीड़ियाँ/तम्बाकू का सेवन किया करते थे – ऐसा तो कई जगह आया है इस पुस्तक में !

“वह  16 वर्ष की आयु में ब्रह्मज्ञानी था व किसी लोकिक पदार्थ की इच्छा न थी” ..…… झूठ नं 3 

और 3 वर्ष  पश्चात (19 वर्ष आयु में) वह ज्ञानी बालक एकदम बिगड़ गया जैसा की आप  उपर  अध्याय 5 की प्रति में देख सकते है ! चिलम जलाने और जमीन से अंगारा निकलने आदि का जो वर्णन इसमें लिखा है इससे स्पष्ट है की बाबा इन 3 वर्षों में जम  कर नशा करना सिख गया ! और सड़कछाप जादूगरी करना भी !

परन्तु इन 3 वर्षों में ऐसा क्या हुआ जो बाबे की ये हालत हुई ? इन 3 वर्षों का वर्णन इस किताब में ही नही है !
वो 16 वर्ष में तेजस्वी आदि-आदि था और 19 वर्ष की आयु में बीड़ियाँ फूंकना कैसे सिख गया ?

ये सारी बात निर्भर करती है उसके 3 वर्षों पर (16 वर्ष से 19 वर्ष)

शिर्डी पहुँचने पर क्या हुआ आगे देखे {निम्न प्रति भी  साँईँ सत्चरित्र अध्याय 5 की ही है } :—


ये क्या बाबा पुनः युवक बन गये !! ………….झूठ नं 4  

एक और बात :-
म्हालसापति और वहा उपस्थित लोग एक 19-20 वर्ष के बालक का अभिनन्दन* कर रहे है ?

इसका मतलब वो बाबा से प्रभावित है, तो फिर बाबा के 16 वर्ष से 19 वर्ष का वर्णन कहाँ है ??
इस किताब में तो नही है !!

बाबा ने उन 3 वर्षों में ऐसा क्या किया की सब प्रभावित हो गये ??

जो खुल्लम खुला बिडीया फूंकता है बड़ों के सामने । चाँद पाटिल निश्चित रूप से 30-35 वर्ष का तो रहा ही होगा! ओर एक 19-20 वर्षीय बालक उसे बीडी देता है ! ले पि !

*यहाँ अभिनन्दन किया गया है , परन्तु अभिनन्दन का कारन नही बताया गया! इसी प्रकार धीरे धीरे आगे भगवान बनाया गया है !*

बस आगे देखते जाइये आप !!!!

निम्न प्रति भी  साँईँ सत्चरित्र अध्याय 5 की ही है  :—

ये क्या बाबा पुनः बड़े (पुरुष) हो गये…………………………….झूठ नं 5

ध्यान दे :-
उपरोक्त प्रति में लिखा है श्री साईंबाबा बगीचे के लिए पानी ढो रहे है और लोग अचम्भा कर रहे है !
(अभी बाबे की आयु २ ० वर्ष ही है! ऊपर प्रति में लिखा है जब प्रथम बार उन्होंने श्री साईं बाबा को देखा तब  आयु २० वर्ष थी) 

यदि एक २ ० वर्षीय युवक बगीचे के लिए पानी ढो रहा है तो लोग इसमें अचम्भा क्यू कर रहे है ??
कोनसी बड़ी बात है ?
ये भूमि (शिर्डी) महान  कैसे हुई? अभी तो हम स्पष्ट रूप से देखते आये  है बाबा ने कोई कमाल नही दिखाया !

फिर आगे पुनः छोटे हो गये !
फिर पहलवान बन गये!
20 वर्ष का युवक पहलवान की तरह रहता था  ! अर्थात सड़क पर चलते फिरते किसी को भी ललकार  लेना , बाहें चड़ा लेना आदि!

इसी पहलवानी के तहत वे एक बार पिटे भी गये :-
शिर्डी में एक पहलवान था उससे बाबा का मतभेद हो गया और दोनों में कुश्ती हुयी और बाबा हार गए (अध्याय 5 साईं सत्चरित्र )

इसी अध्याय  में आगे लिखा है (ध्यान दें)
वामन तात्या नाम के एक भक्त इन्हें नित्य प्रति दो मिट्टी  के घड़े दिया करते थे ! इन घड़ों द्वारा बाबा स्वयं ही पोधों में पानी डाला करते !
वे स्वयं कुए से पानी खींचते और संध्या  समय घड़ों को नीम वृक्ष के निचे रख देते । जैसे ही रखते तो घड़े फुट जाते, क्यू की घड़े कच्चे थे !  और दुसरे दिन तात्या फिर उन्हें 2 घड़े दे देते !
यह क्रम 3 वर्षों तक चला ! (अध्याय ५)

अब बाबा की आयु हो गई है 23  वर्ष !
समझे :–
1. सबसे पहले तो तात्या किसका भक्त था ? साईं का या किसी और का !
यदि साईं का था तो क्यू ? अभी तो साईं ने कुछ करतब नही दिखाया !  तात्या क्या देख कर भक्त बना !

2 रोज के रोज घड़े टूट रहे है न ही बाबा में और न ही तात्या में अक्ल थी की, क्यू न घड़ा ठीक प्रकार से संभाल कर रखा जाये !
रोज के दो घड़े के हिसाब से तात्या ने 3 वर्षों में कितने घड़े खरीदे ?......2190 घड़े !

और फिर क्या बिना तपाये बनाये हुए मिटटी के कच्चे घड़ों में जल ठहर सकता है ?

इस प्रकार की उल-जलूल बातों का क्या अभिप्राय है ? या इसका कोई और अर्थ भी  है जो हम समझने की अपेक्षा इस पागल को पूज रहे है ?
या ये कोई कूट भाषा (Coded language) है !

इसके आगे के अध्यायों में  सारा वर्णन 1910 से 1918 (बाबा की आयु 72 से 80) के बिच का है  उत्तरोंतर बाबा के चमत्कारों के गप्पे और केवल रुपया पैसा की बाते है,  और  लोगो ने बाबा को किस प्रकार पूजा, यह लिखा गया है !

बाबा के जीवन काल की 24 वर्ष आयु से 71 वर्ष आयु तक की घटनाये गायब है !

एक और झूठ : 
एक फ़क़ीर देखा जिसके सर पर एक टोपी, तन पर कफनी और पास में एक सटका  था वे सिर पर एक साफा , कमर में एक धोती और तन ढकने के लिए एक अंगरखा धारण करते थे ! प्रारंभ से ही उनकी वेशभूषा इसी प्रकार की थी !  -अध्याय 7। 

* 3 वर्ष बाबा ने क्या क्या किया ?

एक बार पुनः —-
16 वर्ष आयु में दिखे, 3 वर्ष शिर्डी में रहे

16 +3 =19 वर्ष ।
19 वर्ष की आयु में फिर कहीं निकल गये ।
और जब बारात के साथ आए तो आयु 20 वर्ष थी ।
ठीक है !! इतना हम समझ चुके है !

परन्तु 16 वर्ष में प्रथम बार दिखने के पश्चात तो 3 वर्ष वे शिर्डी में ही रहे !
इन 3 (1095 दिनों) वर्षों का वर्णन इस किताब में है ही नही ! बाबा की  आयु के 16 से 19 वर्ष तक का वर्णन कहाँ है ??

ये तिन वर्ष और एक वर्ष गायब रहा :- हुए ४ वर्ष ? कहाँ था बाबा ४ वर्ष!?………झूठ नं 5  

* बेनामी बाबा :— 
अब तक किसी को बाबे का नाम नही पता ! पहले युवक कहा गया फिर सीधे “साईं” कह दिया गया !

साईं शब्द का अर्थ:–
“साईं बाबा नाम की उत्पत्ति साईं शब्द से हुई है, जो मुसलमानों द्वारा प्रयुक्त फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है पूज्य व्यक्ति और बाबा”

यहाँ देखे :—

फ़ारसी एक भाषा है जो ईरान, ताज़िकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और उज़बेकिस्तान में बोली जाती है।

अर्थात साईं नाम(संज्ञा/noun) नही है , जिस प्रकार मंदिर में पूजा आदि करने वाले व्यक्ति को “पुजारी” कहा जाता है परन्तु पुजारी उसका नाम नही है !
यहाँ साईं भी नाम नही अपितु विशेषण (Adjective) है !
उसी प्रकार ‘बाबा’ शब्द  भी कोई नाम नही !!

और फिर म्हालसापति ने उन्हें सीधे “साईं” कह कर ही क्यू बुलाया ??

साईं ही क्यू??

सभी साईं बाबा ही कहते है तो फिर इसका नाम क्या है ??

इसका नाम है चाँद मियां !!!

हम इसे फ़िलहाल साईं ही कहेंगे !

ये बालक 100 % व्यसनी/नशा करने वाला था क्यू की लावारिश था इसलिए शिक्षा आदि न पा सका !
इसी कारन ये ओछे स्वभाव वाला तथा चिड-चिडा भी था !
बात बात पर क्रोधित होना तथा स्त्रिओं को गलिया  देना इसके ओछे स्वभाव व चिडचिडेपण का प्रमाण है ! यह आगे देखने को मिलेगा !

सब कुछ झूठ ही झूठ है इस किताब  में ! ये किताब कम से कम 4-5 जनों ने मिलकर सोचा समझ कर लिखी है ! फिर भी हड़बड़ी में कई गलतिया रह ही गई ! या यूँ कह लो की सत्य नही छुप सकता !

झूठ पर सदेव सत्य की और बुराई पर सदेव  अच्छाई की विजय होती है ! जय श्री राम 

* एक और बड़ा झूठ व आस्था के नाम पर धोखा:-

लेखक  “हेमाडपंत” ने लिखा है की 1910 में मैं बाबा से मिलने मस्जिद गया ! (अध्याय १ )
मेने बाबा की पवित्र जीवन गाथा का लेखन प्रारंभ कर दिया (अध्याय २ )

और बाबा से उनके जीवन पर किताब लिखने की अनुमति मांगी !

और मैंने महाकव्य “साईं सच्चरित्र” की रचना भी की ! अर्थात साईं सच्चरित्र की रचना सन 1910 में की !
(अध्याय २ ) ……झूठ नं 6 

साईं सच्चरित्र की रचना हुई कम से कम उनकी मृत्यु के  15-20  वर्ष बाद  अर्थात सन 1933  से 1938   के आसपास ! 
कैसे पता ??
 
यहाँ देखें : 

साईं की मृत्यु के पश्चात का वर्णन : अब कुछ भक्तों को श्री साईं बाबा के वचन याद आने लगे !
किसी ने कहा की महाराज (साईं बाबा) ने अपने भक्तों से कहा था की वे –

“भविष्य में वे आठ वर्ष के बालक के रूप में पुनः प्रकट होंगे” (अध्याय 43)

ऐसा प्रतीत होता है की इस प्रकार का प्रेम सम्बन्ध विकसित करके महाराज (श्री साईं बाबा ) दोरे पर चले गये और भक्तों को दृढ विश्वास है की वे शीघ्र ही पुनः वापिस आ जायेगे ! (अध्याय 43)

और बाबा पुनः आये भी !! पता है वो कोन  थे ? ये थे  — सत्य साईं बाबा !


ध्यान से समझे:-

साईं बाबा की मृत्यु हुई सन 1918 में !
उसके ठीक 8 वर्षों पश्चात बाबा पुनः आ गये सत्य साईं बन कर !

सत्य साईं बाबा  (जन्म: 23 नवंबर 1926 ; मृत्यु: 24 अप्रैल 2011),

सत्य साईं बाबा का बचपन का नाम सत्यनारायण राजू था। बाबा को प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु शिरडी के साईं बाबा का अवतार माना जाता है।

आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में पुट्टपर्थी गांव में एक सामान्य परिवार में 23 नवंबर 1926 को जन्मे सत्यनारायण राजू ने 20 अक्तूबर 1940 को 14 साल की उम्र में खुद को शिरडी वाले साईं बाबा का अवतार कहा। जब भी वह शिरडी साईं बाबा की बात करते थे तो उन्हें ‘अपना पूर्व शरीर’ कहते थे।

इससे स्पष्ट है की “सत्य साईं बाबा” उन्ही लोगो में से किसी के घर जन्मा जिन्होंने इसके जन्म से 8 वर्ष पूर्व साईं को भगवन बनाया ! चूँकि  सत्य साईं बाबेके जन्म की बात  साईं सच्चरित्र में आ चुकी है इसलिए ये किताब बाबे(शिर्डी वाले)  की मृत्यु के 15-20 वर्ष  पश्चात लिखी गई ! इस समय सत्य साईं बाबा की आयु रही होगी 7 से 12 वर्ष !

इसे  निश्चत रूप से अच्छे से समझाया गया की तुझे यही कहना है की तू साईं बाबा का अवतार है ! ये इन्होने कहा 14 वर्ष की आयु में अर्थात साईं की मृत्यु  के 20 वर्ष पश्चात !

इसने शिर्डी वाले बाबे के बारे में 8 -10 बाते लोगो को बता दी होंगी  की मैंने पिछले साईं जन्म में ये ये किया, जैसा की इसे 12-13 वर्ष की आयु में रटा दीया होगा !

चूँकि शिर्डी साईं की पुनः प्रकट होने की बात सत्य निकली “इससे शिर्डी साईं की धाक जम  गई ! ”
और इसकी भी जम गई!

इसी तथ्य के कारन शिर्डी साईं को प्रसिद्धी मिलनी शुरू हुई ! इससे पूर्व शिर्डी साईं को गली का कुता  भी नही जनता था  आगे सिद्ध किया गया है !

* ये है सारा खेल!

सत्यनारायण राजू ने शिरडी के साईं बाबा के पुनर्जन्म की धारणा के साथ ही सत्य साईं बाबा के रूप में पूरी दुनिया में ख्याति अर्जित की। सत्य साईं बाबा अपने चमत्कारों के लिए भी प्रसिद्ध रहे और वे हवा में से अनेक चीजें प्रकट कर देते थे और इसके चलते उनके आलोचक उनके खिलाफ प्रचार करते रहे।वैसे ये भी एक नंबर का नाटक खोर था !

मेने सुना है की सत्य साईं (राजू) के पुनर्जन्म का किस्सा इसकी(राजू की ) पुस्तक में है ! (मेने इसकी पुस्तक नही पढ़ी ) 

“पुट्टापर्थी के सत्य साईं इस दुनिया को एक साल पहले अलविदा कह गये थे. उनके चमत्कारों और दावों पर सवाल उठे तो भक्तों को उनमें भगवान दिखते थे. उसी सत्य साईं ने सालों पहले ये भविष्यवाणी की थी कि अपने देहांत के एक साल बाद वो फिर अवतार लेंगे. इसीलिए सवाल उठ रहा है कि कहां है सत्य साईं का अवतार”

जरा सोचिये, ये लोग इतने पापी है की इनकी मुक्ति ही नही हो  पा रही, बार बार जन्म ले रहे है ! ओर इसी प्रकार ये लोग पुनर्जन्म लेते रहेंगे,


अभी के भारतीय, महान ऋषियों की संताने होकर भी मुर्ख है! इनके पीछे हो जाते है.

*ये किताब कितनी सही कितनी गलत ?

दोस्तों उपर हम देख चुके है की ये किताब निश्चित रूप से सत्य साईं (राजू) के जन्म के पश्चात लिखी गई !
तभी लोगो ने सोचा की राजू को ही बाबा का पुनर्जन्म सिद्ध करना है तभी राजू के जन्म की बात साईं सच्चरित्र में आयी है !

क्यू की साईं की प्रसिद्धी मात्र इसी एक तथ्य पर निर्भर करती थी की :-

“भविष्य में वे 8 वर्ष के बालक के रूप में पुनः प्रकट होंगे” (अध्याय 43)

राजू जन्मा  सन 1926 में अर्थात बाबा की मृत्यु के 8 वर्ष पश्चात !

इस हिसाब से “साईं सच्चरित्र” लिखने की  कम से कम तारिक बनती है सन 1926 (राजू का जन्म)..

“इससे पहले किताब का लिखा जाना संभव ही नही” — यह मेरा दावा है !!
क्यू की राजू के जन्म की बात उस किताब में दो जगह आ चुकी है !

* गणितीय विवेचन :— {एक और बड़ा खुलासा}

1. “साईं सच्चरित्र” लिखे जाने का कम से कम वर्ष सन 1926 !

2. बाबा 16 वर्ष में दिखे, 3 वर्ष रहे फिर 1 वर्ष गायब इस प्रकार 20 वर्ष की आयु में बाबा का शिर्डी पुनः आगमन व मृत्यु होने तक वही निवास !

साईं बाबा का जीवन काल 1838 से 1918 (80 वर्ष) तक था (अध्याय 10)
अर्थात बाबा 20 वर्ष के थे सन 1858 में !

इस किताब में जितनी भी बाबा की लीलाएं व चमत्कार लिखे गये है वे सभी 20 वर्ष के आयु के पश्चात के ही है ,   क्यू  की 20 वर्ष की आयु में ही वे शिर्डी में मृत्यु होने तक रहे !

3. स्पष्ट है जो लीला बाबा ने सन 1858 से करनी प्रारंभ की वो लिखी गई इस किताब में सन 1926 मे अर्थात (1926-1858) 68 वर्षों पश्चात !

अब जरा दिमाग, बुद्धि व अपने विवेक का प्रयोग करिये और सोचिये 68 वर्ष पुराणी घटनाओं को इस किताब में लिखा गया वो कितनी सही  होंगी ?

अब यदि ये माने की किताब लिखने वालों ने जो भी लिखा है वो सब आँखों देखा हाल है तो किताब लिखने
वालों की सन 1858 में आयु क्या होगी ?

* ध्यान से समझे:–

1. जैसा की किताब लिखने  वाले बहुत ही चतुर किस्म के लोग थे तभी उन्होंने इस किताब को उलझा कर रख दिया, बाबा के सन्दर्भ में जहाँ जहाँ उनकी आयु व लीला करने का सन लिखने की नोबत आयी वहां वहां उन्होंने  बाते एक ही स्थान पर न लिख कर टुकड़ों में लिखी जैसे :

बाबे के सर्व-प्रथम देखे जाने की आयु लिखी 16 वर्ष पर सन नही लिखा —> अध्याय 4 में 

जीवन काल 1838 से 1918 लिखा  —>अध्याय 10  में 

इस बिच बाबे  के 3 वर्ष, आयु 16 से 19 को पूरा गायब ही कर दिया ! 

और बचपन पूरा अँधेरे में है 

युवक –>व्यक्ति/फ़क़ीर–>युवक —>व्यक्ति/पुरुष

इस चतुराई से साफ है की वे(किताब लिखने वाले) 40 से 60 वर्ष के रहे होंगे  सन 1926 में जब किताब लिखनी प्रारंभ की !

1. हम 40 वर्ष माने तो 1858 में वे(किताब लिखने वाले) पैदा भी नही हुए !  1926-40=1886>1858

2. किताब लिखने वालों की आयु सन 1926 में 50 वर्ष माने तो भी वे 1858 में पैदा नही हुए !

3. 60 वर्ष माने तो भी पैदा नही हुए —-> 1926-60 = 1866 > 1858

4. 68 वर्ष माने तो किताब लिखने वाले जस्ट पैदा ही हुए थे जब बाबा 20 वर्ष के थे —> 1926-68=1858 (1858=1858)

ये तो संभव ही नही की किताब लिखने वाले सन 1858 में जन्मे और जन्म लेते ही  बाबे की लीलाए देखि समझी और 1926 में किताब में लिख दी हो !

तो अब क्या करे ???
किताब लिखने वालों की आयु 68 वर्ष होने भी संभव नही, आयु बढ़ानी पड़ेगी !

माना किताब लिखने वाले बाबे की लीलाओं के समय (सन 1858  से आगे तक) थे 20 वर्ष के,
अर्थात बाबे की और किताब लिखने वालों की आयु सन 1858 में 20वर्ष (एक बराबर) थी क्यू की कम से कम 20 वर्ष आयु लेनी ही पड़ेगी तभी उन्होंने 1858  में  लीलाए देखि होंगी व समझी होंगी !

1858  में 20 वर्ष के तो सन 1926 में हुए —-> 88 वर्ष के (कम से कम )
बाबा खुद ही 80 वर्ष में मर गये तो 88 वर्ष का व्यक्ति क्या जीवित होगा ??
यदि होगा तोभी 88 वर्ष की आयु में ये किताब लिखा जाना संभव ही नही, 88 वर्ष का व्यक्ति चार पाई पकड़ लेता है !

फिर में कह चूका हु की  ये किताब लिखने का काम करने वाले चतुर जवान लोग थे !
लगभग 40 से 60 वर्ष के बिच के !
और इन आयु का व्यक्ति 1858 में पैदा भी नही हुआ !!  ……..झूठ नं 7

ये किताब पूरी एक महाधोखा है ये राजू के जन्म के पश्चात लिखी गई और कोरे झूठ ही झूठ है इसमें !

* एक और झूठ :

फ़क़ीर से साधू बनाने का प्रयास :–

Undiscovered Photos of Shirdi Sai Baba

1st
2nd
 

Photo of young Shirdi Sai Baba

निम्न तस्वीर में बिच वाला साईं नही है ! 1st वाले व्यक्ति की तस्वीर  बिच वाली तस्वीर 2nd से बदल दी जाएगी । क्योकि 2nd वाले की सूरत भोली है

New photo of Shirdi Baba – umbrella group

झूठ नं 8 “Recently there appeared on some websites what was claimed to be a recently discovered photo of Shirdi Sai Baba.It is clearly a photo of that much revered Indian ‘saint’.”

बिच वाले बाबे के माथे पर बंधा कपडा भी नकली है ! गौर से देखें :- photo shop से एडिट किया हुआ है !
मेने नही किया है इस साईट पर उपलब्ध है :– https://robertpriddy.wordpress.com/2008/07/04/undiscovered-photo-of-shirdi-sai-baba/ 

* एक और महाझूठ !!

साँईँ के चमत्कारिता के पाखंड और झूठ का पता चलता है, उसके “साँईँ चालिसा” से।

आईये पहले चालिसा का अर्थ जानलेते है:-

“हिन्दी पद्य की ऐसी विधा जिसमेँ चौपाईयोँ की संख्या मात्र 40 हो, चालिसा कहलाती है।”
 
सर्वप्रथम देखें की चोपाई क्या / कितनी बड़ी होती है ......

हनुमान चालीसा की प्रथम चोपाई :—
 
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥…1

ठीक है !!
अब साँईँ चालिसा की एक चोपाई देखें :–
 
पहले साईं के चरणों में, अपना शीश नवाऊँ मैं।
कैसे शिर्डी साईं आए, सारा हाल सुनाऊँ मैं।।

यदि पहली पंक्ति को (कोमा के पहले व बाद वाले भाग को) एक चोपाई माने तो चोपाईयों की संख्या हुई :–  204
और यदि दोनों पंक्तियों को एक चोपाई माने तो चोपाईयों की संख्या हुई :–  102

हनुमान चालीसा में पुरे 40  है
साँईँ चालिसा में  कुल 204  है यहाँ देखें  :



तनिक विचारेँ क्या इतने चौपाईयोँ के होने पर भी उसे चालिसा कहा जा सकता है??

नहीँ न?…..
बिल्कुल सही समझा आप लोगोँ ने….

जब इन व्याकरणिक व आनुशासनिक नियमोँ से इतना से इतना खिलवाड़ है, तो साईँ के झूठे पाखंडवादी चमत्कारोँ की बात ही कुछ और है!

कितने शर्म की बात है कि आधुनिक विज्ञान के गुणोत्तर प्रगतिशिलता के बावजूद लोग साईँ जैसे महापाखंडियोँ के वशिभूत हो जा रहे हैँ |

क्या इस भूमि की सनातनी संताने इतनी बुद्धिहीन हो गयी है कि जिसकी भी काल्पनिक महिमा के गपोड़े सुन ले उसी को भगवान और महान मानकर भेडॉ की तरह उसके पीछे चल देती है ?

इसमे हमारा नहीं आपका ही फायदा है …. श्रद्धा और अंधश्रद्धा में फर्क होता है,
श्रद्धालु बनो ….भगवान को चुनो।

* बाबा फ़क़ीर अथवा धनि  

1. बाबा की चरण पादुका स्थापित करने के लिए बम्बई के एक भक्त ने 25 रुपयों का मनीआर्डर भेजा । स्थापना में कुल 100 रूपये व्यय हुए जिसमे 75  रुपये चंदे द्वारा एकत्र हुए ! प्रथम पाच वर्षों तक कोठारे के निमित 2 रूपये मासिक भेजते रहे । स्टेशन से छडे ढोने और छप्पर बनाने का खर्च 7   रूपये 8 आने सगुण मेरु नायक ने दिए ! {अध्याय 5}

25 +75 =100
2 रु  मासिक, 5 वर्षों तक = 120 रूपये

100 +120 =220  रूपये कुल

ये घटनाये 19वीं सदी की है उस समय लोगो की आय 2-3 रूपये प्रति माह हुआ करती थी ! तो 220 रूपये कितनी बड़ी रकम हुई ??

उस समय के लोग  2-3 रूपये प्रति माह में अपना जीवन ठीक ठाक व्यतीत करते थे !
और आज के 10,000 रूपये प्रति माह में अपना जीवन ठीक ठाक व्यतीत करते है !
तो उस समय और आज के समय में रुपयों का अनुपात (Ratio) क्या हुआ ?
 10000/3=3333.33
तो उस समय के  220 रूपये आज के कितने के बराबर हुए ?
 220*3333.33=733332.6 रूपये (7 लाख 33 हजार रूपये)

यदि हम यह अनुपात (ratio) 3333.33 की अपेक्षा कम से कम 1000  भी माने तो :-
उस समय के 220 रूपये अर्थात आज के कम से कम 2,20000  (2 लाख 20 हजार रूपये) {अनुपात=1000 }

इतने रूपये एकत्र हो गये ?
मस्त गप्पे है इस किताब में तो !
स्थापना में कुल 100 रूपये व्यय हुए =1,00,000 (1 लाख रूपये) 

2. बाबा का दान विलक्षण था ! दक्षिणा के रूप में जो धन एकत्र होता था उसमें से वे किसी को 20, किसी को 15 व किसी को 50 रूपये प्रतिदिन  वितरित कर देते थे ! {अध्याय 7 }

3. बाबा हाजी के पास गये और अपने पास से 55 रूपये निकाल कर हाजी को दे दिए !  {अध्याय 11 }

4. बाबा ने प्रो.सी.के.नारके से 15 रूपये दक्षिणा मांगी, एक अन्य  घटना में उन्होंने श्रीमती आर. ए. तर्खड से 6 रूपये  दक्षिणा मांगी {अध्याय 14  }

5 . उन्होंने जब महासमाधि ली तो 10 वर्ष तक हजारों रूपये दक्षिणा मिलने पर भी उनके पास स्वल्प राशी ही शेष थी । {अध्याय 14   }

यहाँ हजारों रूपये को कम से कम 1000 रूपये भी माने तो आप सोच सकते है कितनी बड़ी राशी थी ये ?
उस समय के 1000  अर्थात आज के 10  लाख  रूपये कम से कम ! {अनुपात =1000 }

6 . बाबा ने आज्ञा  दी की शामा के यहाँ जाओ और कुछ समय वर्तालाब  कर 15 रूपये दक्षिणा ले आओ ! {अध्याय 18  }

7 .बाबा के पास जो दक्षिणा एकत्र होती थी,उनमे से वे 50 रूपये प्रतिदिन बड़े बाबा को दे दिया करते थे !
{अध्याय 23 }

8 . प्रतिदिन दक्षिणा में बाबा के पास  बहुत रूपये इक्कठे हो जाया करते थे, इन रुपयों में से वे किसी को 1, किसी को 2 से 5, किसी को 6,  इसी प्रकार 10 से 20  और 50  रूपये तक वो अपने भक्तों को दे दिया करते थे !
{अध्याय 29  }

. निम्न प्रति अध्याय 32 की है :

बाबा की कमाई  = 2 (50+100 +150 ) = 600 रूपये 
वाह

10 . बाबा ने काका से 15 रूपये दक्षिणा मांगी और कहा में यदि किसी से 1 रु. लेता हु तो 10 गुना लौटाया करता हु ! (अध्याय 35 )

11 . इन शब्दों को सुन कर श्री ठक्कर ने भी बाबा को 15 रूपये भेंट किये (अध्याय 35 )

12 . गोवा से दो व्यक्ति आए और बाबा ने एक से 15रूपये दक्षिणा मांगी !(अध्याय 36  )

13  . पति पत्नी दोनों ने बाबा को प्रणाम किया और पति ने बाबा को 500 रूपये भेंट किये जो बाबा के घोड़े श्याम कर्ण के लिए छत बनाने के काम आये !    (अध्याय ३ ६  )

बाबा के पास घोडा भी था ?  

ये कोन लोग थे जो बाबा को इतनी दक्षिणा दिए जा रहे थे !

दोस्तों आप स्वयं ही निर्णय ले ये क्या चक्कर है ??  में तो हेरान  हु !

* बाबे की जिद 
 
14 अक्तूबर, 1918  को बाबा ने उन लोगो को भोजन कर लौटने को कहा ! लक्ष्मी बाई सिंदे को बाबा ने 9 रूपये देकर कहा “मुझे अब मस्जिद में अच्छा नही लगता ” इसलिए मुझे अब बूंटी के पत्थर वाडे में ले चलो, जहाँ में सुख पूर्वक रहूँगा” इन्ही शब्दों के साथ बाबा ने अंतिम श्वास छोड़ दी ! {अध्याय 43 }

1886 में मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन बाबा को दमा से अधिक पीड़ा हुई और उन्होंने अपने भगत म्हालसापति को कहा तुम मेरे शरीर की तिन दिन तक रक्षा करना यदि में वापस लौट आया तो ठीक, नही तो मुझे उस स्थान (एक स्थान को इंगित करते हुए) पर मेरी समाधी बना देना और दो ध्वजाएं चिन्ह रूप में फेहरा देना ! {अध्याय 43}

जब बाबा सन 1886 में  मरने की हालत में थे तब तथा सन  1918  में भी, बाबे की केवल एक ही इच्छा थी मुझे तो बस मंदिर में  ही दफ़न करना

1918-1886 = 32 वर्षों से अर्थात  48 वर्ष की आयु से बाबा के दिमाग में ये चाय बन रही थी !

* जीवन में अधिकतर बीमार व मृत्य बीमारी से !!

बाबा की स्थति चिंता जनक हो गई और ऐसा दिखने लगा की वे अब देह त्याग देंगे ! {अध्याय ३९}

1. बाबे को 1886 अर्थात 48 वर्ष की आयु में दमे की शिकायत हुई !


19 वर्ष की आयु से लगातार चिलम पि रहा था ऊपर सिध्ध किया जा चूका है !

2. दमे से बाबे की हालत मरने जैसी हो गई ! बाबे ने जिस स्थान की और समाधी बनाने को इंगित किया वो स्थान था एक मंदिर (अध्याय 4 में लिखा है ), और मरणासन्न स्थिति में अभी जहाँ वो पड़ा है वो स्थान है.....मस्जिद।

अर्थात मस्जिद में पड़े पड़े इशारा किया मुझे वहा (मंदिर में) गाड़ना !

बाबा रहा सारी उम्र मस्जिद में और उसकी जिद थी की मुझे गाड़ना एक मंदिर में !

इससे एक और बात साफ है शिर्डी के उस गाँव या उन  गलियों में  एक मंदिर और एक मस्जिद थे
बाबा रहा मस्जिद में ही(स्वेइच्छा से ) :- वो मुस्लिम ही था इससे साफ दिखता है !

28 सितम्बर 1918 को बाबा को साधारण-सा  ज्वर (fever) आया । ज्वर 2 - 3 दिन रहा । बाबा ने भोजन करना त्याग दिया । इसे साथ ही उनका शरीर दिन प्रति दिन क्षीण व दुर्बल होने लगा । 17 दिनों के पश्चात अर्थात 14 अक्तूबर 1918 को को 2 बजकर 30 मिनिट पर उन्होंने अपना शरीर त्याग किया !{अध्याय 42 }

अब सोचिये ये आदमी 17 दिनों तक बीमार रहा और पहले भी दमे से ग्रसित रहा और तडपता रहा !

बाबा समाधिस्त हो गये ” – यह ह्रदय विदारक दुख्संवाद सुन सब मस्जिद की और दोड़े {अध्याय 43}
स्पष्ट है बाबे ने मस्जिद में दम तोडा !

लोगो में बाबा के शरीर को लेकर मतभेद हो गया की क्या किया जाये और यह ३ ६ घंटों तक चलता रहा  {अध्याय 43}

इस किताब में बार बार समाधी/महासमाधी/समाधिस्त शब्द आया है किन्तु बाबा की मृत्यु दमे व बुखार से हुई ! बाद में दफन किया गया  अतः उस स्थान को समाधी नही कब्र कहा जायेगा !!

समाधी स्वइच्छा देहत्याग को कहते है !

3 दिनों पुरानी लाश को बाद में मंदिर में दफन किया गया !

बाबा का शरीर अब वहीँ विश्रांति पा  रहा है , और फ़िलहाल वह समाधी मंदिर नाम से विख्यात है {अध्याय 4}

बाबा का शरीर अब वहीँ विश्रांति पा  रहा है” — स्पष्ट है  इसे दफन ही किया गया !

 जहाँ उसे दफ़न किया गया वो मंदिर था किस का ? 
भगवान श्री कृष्ण का ! 

बुधवार संध्या को बाबा का पवित्र शरीर बड़ी धूमधाम से  लाया गया और  विधिपूर्वक उस स्थान पर समाधी बना दी गई ! सच तो ये है की बाबा ‘मुरलीधर’ बन  गये और समाधी मंदिर एक पवित्र देव स्थान ! {अध्याय ४३ }

श्री कृष्ण के मंदिर में इस सड़ी लाश को गाडा गया !! और पूज दिया गया !

कई साईं भक्तों का ये भी कहना है की बाबा ने कभी भी स्वयं को भगवान नही कहा, तो आईये उनके मतिभ्रम का भी समाधान करते है :-

 निम्न प्रति साईं सत्चरित्र अध्याय 3 की है : 


इस पुस्तक में और भी पचासों जगह बाबा ने स्वयं को ईश्वर कहा है !

यह केवल एक ही उदहारण है !

ये हाल है दोस्तों करोडो भारतियों की आस्था के साथ बलात्कार किया गया है एक बार नही बारम्बार !!!

 जिन्हें ईश्वर ने जरा सी भी बुद्धि दी है वो तो उपरोक्त वर्णन से ही समझ चुके होगे । 

शिर्डी वाले का भांडा फूटते ही  सत्य साईं का अपने आप ही फुट गया क्यू की सत्य साईं उसी का अवतार था !

साईं और सत्य साईं  की पोल पूरी खुल ही चुकी है परन्तु हमारे करोडो भाई-बहिनों-माताओं आदि के ह्रदय में इनका  जहर घोला गया वो उतरना अति अति आवश्यक है ! 

इसलिए आगे बढ़ते है ओर लोगो को जागरूक करते हे। 

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साईं बाबा का जीवन काल 1838 से 1918 (80 वर्ष) तक था (अध्याय 10 ) , 

उनके जीवन काल के मध्य हुई घटनाये जो मन में शंकाएं पैदा करती हैं की क्या वो सच में भगवान थे .....

क्या वो सच में लोगो का दुःख दूर कर सकते है?
क्या साँईं ईश्वर या कोई अवतारी पुरूष है?
भारतभूमि पर जब-जब धर्म की हानि हुई है और अधर्म मेँ वृध्दि हुई है तब तब परमेश्वर साकाररूप मेँ अवतार ग्रहण करते हैँ और तब तक धरती नहीँ छोड़ते जबतक सम्पूर्ण पृथ्वी अधर्महीन नहीँ हो जाती लेकिन साईँ के जीवनकाल मेँ पूरा भारत गुलामी की बेड़ियोँ मे जकड़ा हुआ था, मात्र अंग्रेजोँ के अत्याचारोँ से मुक्ति न दिला सका तो साईँ अवतार कैसे?

न ही स्वयं अंग्रेजोँ के अत्याचारोँ के विरुद्ध आवाज़ उठाई और न ही अपने भक्तों को प्रेरित किया । 

इसके अतिरिक्त  हजारों तरह की समस्या भी थी :- गौ हत्या, भूखमरी तथा समाज में फैली अन्य  कुरुतियाँ ! इसके विरुद्ध भी एक शब्द नही बोला  !! जबकि अपनी पूरी आयु (80 वर्ष) जिया  !!

साईं सच्चरित्र में बताया गया है की बाबा की  जन्म तिथि सन 1838 के आसपास थी ।  हम 1838 ही मान  कर चलते है । झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई ने  1857 की क्रांति में महत्व पूर्ण योगदान दिया तथा लड़ते लड़ते विरांगना हुई ।  1857 में बाबा की आयु 19  वर्ष के आस पास रही होगी एक अवतार के धरती पर मोजूद होते हुए स्त्रियों को युद्ध क्षेत्र में जाना पड़ेगा ? अब खुद सोचिए ओर विचार कीजिए। 

कृपया अपने घरों मैं साईं की सच्चाई उजागर करे पाखंड को होने से रोके। 

सुंदरकांड के 25वें दोहे में गूढ़ रहस्य

तुलसीदास जी ने लिखा जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी  "हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास  अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।...