Thursday, November 4, 2021

धूमावती

कैसा है धूमावती माता का स्वरूप :
* मां पार्वती का धूमावती स्वरूप अत्यंत उग्र है। 
* मां धूमावती विधवा स्वरूप में पूजी जाती हैं। 
* मां धूमावती का वाहन कौवा है। 
* श्वेत वस्त्र धारण कर खुले केश रूप में होती हैं।

मंत्र : 
ॐ धूं धूं धूमावत्यै फट्।। 
धूं धूं धूमावती ठ: ठ:।।

मां धूमावती का तांत्रोक्त मंत्र :
धूम्रा मतिव सतिव पूर्णात सा सायुग्मे। 
सौभाग्यदात्री सदैव करुणामयि:।।
धूमावती दस महाविद्या में से सातवीं हैं। 
(दस महाविद्याएं इस प्रकार है- काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी व कमला।)
इनका रूप विकराल है। वृद्धा, कृशकाय, वक्रदंता व विधवा हैं। बिखरे बाल के साथ रथ पर सवार हैं। रथ पर कौआ भी बैठा हुआ है। इनके मुख्य अस्त्र मूसल और सूप हैं। वे इसी से सृष्टि में प्रलय लाने में सक्षम हैं। लक्ष्मी की बड़ी बहन होने के कारण ज्येष्ठा लक्ष्मी भी कही जाती हैं।

पहली कहानी (मुल कहानी): 
मां धूमावती के प्राकट्य से संबंधित कथा अनूठी हैं। जब सती ने पिता के यज्ञ में स्वेच्छा से स्वयं को जला कर भस्म कर दिया तो उनके जलते हुए शरीर से जो धुआं निकला, उससे धूमावती का जन्म हुआ। इसीलिए वे हमेशा उदास रहती हैं। यानी धूमावती धुएं के रूप में सती का भौतिक स्वरूप है। सती का जो कुछ बचा रहा वह एक उदास धुआं था।

दूसरी कहानी (सांकेतिक कहानी):
पुराणों के अनुसार एक बार मां पार्वती को बहुत तेज भूख लगी होती है किंतु कैलाश पर उस समय कुछ न रहने के कारण वे अपनी क्षुधा शांत करने के लिए भगवान शंकर के पास जाती हैं और उनसे भोजन की मांग करती हैं किंतु उस समय शंकरजी अपनी समाधि में लीन होते हैं। मां पार्वती के बार-बार निवेदन के बाद भी शंकरजी ध्यान से नहीं उठते और वे ध्यानमुद्रा में ही मग्न रहते हैं।

मां पार्वती की भूख और तेज हो जाती है और वे भूख से व्याकुल हो उठती हैं, परंतु जब मां पार्वती को खाने की कोई चीज नहीं मिलती है, तब वे श्वास खींचकर शिवजी को ही निगल जाती हैं। भगवान शिव के कंठ में विष होने के कारण मां के शरीर से धुआं निकलने लगता है, उनका स्वरूप श्रृंगारविहीन तथा विकृत हो जाता है तथा मां पार्वती की भूख शांत होती है।

तत्पश्चात भगवान शिव माया के द्वारा मां पार्वती के शरीर से बाहर आते हैं और पार्वती के धूम से व्याप्त स्वरूप को देखकर कहते हैं कि अबसे आप इस वेश में भी पूजी जाएंगी। इसी कारण मां पार्वती का नाम 'देवी धूमावती' पड़ा। 

पुराणों में अभिशप्त, परित्यक्त, भूख लगना और पति को निगल जाना ये सब सांकेतिक प्रकरण हैं। यह इंसान की कामनाओं का प्रतीक है, जो कभी ख़त्म नहीं होती और इसलिए वह हमेशा असंतुष्ट रहता है। मां धूमावती उन कामनाओं को खा जाने यानी नष्ट करने की ओर इशारा करती हैं।

विशेष : कुछ लोगों का मानना है गृहस्थ लोगों को  इन देवी की साधना नहीं करनी चाहिए। 

इन महाविद्या का स्थायी आह्वाहन नहीं होता अर्थात इन्हे लंबे समय तक घर में स्थापित या विराजमान होने की कामना नहीं करनी चाहिए क्योंकि ये दुःख, क्लेश और दरिद्रता की देवी हैं। 
जप शुरू करने से पहले आवाहन करें और ख़त्म होने पर विसर्जन कर दें। 

आध्यात्मिक शक्ति जगाने में सर्वोत्तम:
महाविद्याएं सब कुछ देने में समर्थ हैं। फिर भी सबका मकसद अलग-अलग है। साधना के समय उसे ध्यान में रखें। धूमावती दारुण विद्या हैं। वे धन से लेकर शत्रुनाश में भी उपयोगी है। लेकिन आध्यात्मिक शक्ति के लिए श्रेष्ठ हैं। उनके रूप में ही असांसारिक भाव है। वे बंधनों से मुक्त कर ऊपर उठाती हैं। अतः साधकों के लिए यही मार्ग बेहतर है।

धूमावती उपासना के प्रमुख मंत्र
सप्ताक्षर मंत्र : धूं धूमावती स्वाहा।

ध्यान : 
येत् कालाभ्रनीलां विकलित वदनां काकनासां विकर्णाम्। संमार्जन्युक सूर्पैयुत मुसलं करां वक्रदंतां विषास्याम्।। 

ज्याष्ठां निर्वाणवेषा प्रकुटित नयनां मुक्तेकेशीमुदाराम्। शुष्कोत्तुंगाति तिर्यक् स्तनभर युगलां निष्कृपां शत्रुहन्त्रीम।।

विनियोग : इस मंत्र के ऋषि नारसिंह हैं। 
पंक्तिछंद: धूमावती देवता हैं। 
धूं बीज, स्वाहा शक्ति: संग शत्रुनिग्रह के लिए जप है।
अंगन्यास : धां, धीं, धूं, धैं, धौं, ध:।

अष्टाक्षर मंत्र
धूं धूं धूमावती स्वाहा। (मेरूतंत्र के अनुसार)।
धूं धूं धूमावति स्वाहा (मंत्रमहोदधौ के अनुसार)।
विनियोग : इस मंत्र के ऋषि पिप्पलाद ऋषि हैं।

अष्टाक्षर मंत्र
धूं धूमावती स्वाहा ठ: ठ:। (शाक्त प्रमोद के अनुसार)।
अंगन्यास : ऊं धां, ऊं धीं, ऊं धूं, ऊं धें, ऊं धौं, ऊं ध:।

दशाक्षर मंत्र
धूं धूं धूं धूमावती स्वाहा।
विनियोग : इस मंत्र के ऋषि स्कंद हैं।
पंक्ति छंद है।
देवता धूमिनी, धूं बीज एवं शक्ति स्वाहा हैं।

चतुर्दशाक्षर मंत्र
धूं धूं धुर धूमावती क्रों फट् स्वाहा।
विनियोग : इस मंत्र के ऋषि क्षपणक है।
गायत्री छंद है।
देवता धूमावती, बीज धूं वशक्ति स्वाहा है।
विशेष-शत्रु के उच्चाटन में प्रयोग अमोघ है।

पंचदशाक्षर मंत्र
(अ) ऊं धूं दूमावति देवदत्त धावति स्वाहा। (देवदत्त के स्थान पर अमूकं पढ़ें। अर्थात जिस शत्रु के लिए कर रहे हों का नाम दें।

(ब) धूं धूं धूं धुरू धूमावति क्रों फट् स्वाहा।

सभी मंत्रों के लिए विधि:
मंत्र जप के लिए पहले संकल्प लें। मंत्रों का एक लाख जप करें। तदनुसार दशांश हवन करें। जप से पहले रोज देवी का पूजन करें। शुभ दिन में साधना शुरू करें। कृष्णपक्ष की चतुर्दशी उपयुक्त दिन है। उस दिन भी उपवास रखकर शुरू कर सकते हैं। जप अवधि में कम से कम बातचीत करें। जितना मौन रहेंगे, अच्छा होगा। मंदिर में हों तो शिवलिंग की भी पूजा करें। अन्यथा शिव बनाकर पूजा करना उचित। धूमावती साधना : शत्रुनाश व धन प्राप्ति में अमोघ है।

No comments:

Post a Comment

सुंदरकांड के 25वें दोहे में गूढ़ रहस्य

तुलसीदास जी ने लिखा जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी  "हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास  अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।...