वेद और पुराण विज्ञान पर आधारित माने जाते हैं।
समय-समय पर विभिन्न प्रयोगों द्वारा यह बात साबित भी हुई है। सबसे बड़ी बात यह है कि जिन बातों को आज विज्ञान आधुनिक सभ्यता की खोज मानता है, प्राचीन भारतीय सभ्यताओं में वह पहले ही किसी ना किसी रूप में बताई जा चुकी होती हैं। यहां हम बात पृथ्वी का पहला मानचित्र बनाने की कर रहे हैं।
दुनिया के कई देश अपने-अपने वैज्ञानिकों द्वारा इसे पहले बनाए जाने का दावा कर चुके हैं। लेकिन कुछ ऐसे प्रमाण हैं जिससे यह साबित होता है कि पृथ्वी का पहला मानचित्र भारत में बना था और उसेबनाया था पंडित रामानुजाचार्य ने।
पंडित रामानुजाचार्य ने महाभारत में वर्णित एक प्रसंग के अनुसार पहली बार पृथ्वी के भौगोलिक आकार की कल्पना करते हुए उसका मानचित्र तैयार किया था। महाभारत का वह प्रसंग महाभारत युद्ध के समय धृतराष्ट्र और संजय की बातचीत पर आधारित है।
आंखें ना होने के कारण धृतराष्ट्र के सारथी संजय को महर्षि वेदव्यास ने दिव्यदृष्टि प्रदान की थी कि वह वहीं से बैठकर कहीं के भी दृश्य देखकर धृतराष्ट्र को आंखो देखी वृत्तांत सुना सकता था। उसी समय धृतराष्ट्र के पूछने पर संजय ने उन्हें संपूर्ण ब्रहाण्ड के दृश्य का वर्णन किया था।
इसमें पृथ्वी को द्वीप बताया गया है।
महाभारत के श्लोक में यह इस प्रकार वर्णित है:
“यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः।
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।।"
अर्थात, जिस प्रकार पुरुष दर्पण के सम्मुख अपना मुख देखता है, चंद्रमंडलमें यह द्वीप भी उसी प्रकार दिखाई देती है। इसके दो अंशों में पीपल के पत्ते दिखाई देते हैं और दो अंशों में खरगोश दिखाई देता है।
आचार्य रामानुज का मानचित्र
महाभारत में वर्णित ब्रह्माण्ड की इस रूपरेखा के आधार पर दँण भारत के संत और महान विचारक रामानुजाचार्य ने सदी में पृथ्वी का जो पहला मानचित्र बनाया था वह चित्र में दिखाए अनुसार था। बाद में जब इसे उल्टा किया गया, तो वह आज ग्लोब पर वर्णित दुनिया के मानचित्र के समान दिखा।
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